"एक मुकम्मल तस्वीर बनाने की चाहत में ..... झरते हैं कुछ रंग ....घुलती हैं कुछ भावनाएं ..सिमट जाते हैं कुछ स्वप्न ...यही है ..मन के कैनवस पर तूलिका के शब्द-रंग "
सोमवार, 13 अगस्त 2012
बुधवार, 8 अगस्त 2012
एक रिश्ता ...एक अमूल्य निधि
तुम बिखरो ..
तो समेट लूंगी
हर तिनका तुम्हारा ....
हर बिखरे तार से बुन दूँगी
एक नया रिश्ता ....
हर कतरे से
एक नया खज़ाना गढ़ लूंगी
हर बहके भाव को
डपट कर ले आऊंगी
तुम्हारी हर अमानत
सौंप दूँगी तुम्हें
......
बिखरना मत मेरी जान
क्योंकि तुम सलामत हो
तो सलामत हैं
मेरी दोस्ती की निधि
तुम साथ होगी तो
एक बार फिर बाँट लेंगे
तनहाइयों के लम्हे
दुःख के कतरों को
चिंदी चिंदी कर
उडा देंगे,फूंक मार कर
और जी लेंगे
खुशियों के उन पलों को
जो बुलबुलों की तरह
उड़ जाते हैं
यदि जिए न जाएँ ...
तो समेट लूंगी
हर तिनका तुम्हारा ....
हर बिखरे तार से बुन दूँगी
एक नया रिश्ता ....
हर कतरे से
एक नया खज़ाना गढ़ लूंगी
हर बहके भाव को
डपट कर ले आऊंगी
तुम्हारी हर अमानत
सौंप दूँगी तुम्हें
......
बिखरना मत मेरी जान
क्योंकि तुम सलामत हो
तो सलामत हैं
मेरी दोस्ती की निधि
तुम साथ होगी तो
एक बार फिर बाँट लेंगे
तनहाइयों के लम्हे
दुःख के कतरों को
चिंदी चिंदी कर
उडा देंगे,फूंक मार कर
और जी लेंगे
खुशियों के उन पलों को
जो बुलबुलों की तरह
उड़ जाते हैं
यदि जिए न जाएँ ...
बुधवार, 25 जुलाई 2012
हथेली पर नागफनी
हथेलियों पर
जाने कब कैसे
गिर जाते हैं कुछ
सपनों के बीज
उगते हैं.. ..बढ़ते हैं
जाने कहाँ से पा जाते हैं
खाद पानी
प्रतिकूल परिस्थितियों में भी .
शायद इसी की तलाश में
बहुत गहरे हथेलियों में
बैठ जाती हैं जड़ें इनकी
वक़्त के झंझावात से
कुम्हलाये ...सूखे
ये सपनों के पौधे
गिरा देते हैं
सारी हरी पत्तियाँ
उम्मीदों की .
बंद मुट्ठियों में
सपनें, ..सूखे पत्तों से
चूर हो जाते हैं ..
नया खाद पानी
बनने को शायद
या शायद ..
सीचनें को जड़ें इनकी ..
आज एक ऐसा ही बीज
बो दिया है
अपनी संतति की
हथेली पर
जबकि जानती हूँ
सपना नहीं
नागफनी बोया है मैंने .
जाने कब कैसे
गिर जाते हैं कुछ
सपनों के बीज
उगते हैं.. ..बढ़ते हैं
जाने कहाँ से पा जाते हैं
खाद पानी
प्रतिकूल परिस्थितियों में भी .
शायद इसी की तलाश में
बहुत गहरे हथेलियों में
बैठ जाती हैं जड़ें इनकी
वक़्त के झंझावात से
कुम्हलाये ...सूखे
ये सपनों के पौधे
गिरा देते हैं
सारी हरी पत्तियाँ
उम्मीदों की .
बंद मुट्ठियों में
सपनें, ..सूखे पत्तों से
चूर हो जाते हैं ..
नया खाद पानी
बनने को शायद
या शायद ..
सीचनें को जड़ें इनकी ..
आज एक ऐसा ही बीज
बो दिया है
अपनी संतति की
हथेली पर
जबकि जानती हूँ
सपना नहीं
नागफनी बोया है मैंने .
.
मंगलवार, 5 जून 2012
रंगों का दरिया
लड़की कस के पकड़ लेती
उँगलियों में अपना ब्रश
सारे गहरे रंग समेट ..
ब्रश की नोक पर लगा लेती.
हवा में हाथ उठाती
रंग छिड़कती ..कोशिश करती
कुछ खींचने की ..कुछ आंकने की ..
आड़ी तिरछी लकीरों में घुले रंग
कोई आकार लें..उससे पहले
लड़का अपने हाथ हवा में उठाता
सारे रंग समेट लेता
अपनी हथेलियों में ..
सिद्धहस्त जादूगर की तरह
रंगों का दरिया वापस बहा देता....
क्षितिज के एक कोने से दूसरे कोने तक
बिखर जाते रंग ...इन्द्रधनुष से
कुछ देर दोनों जादू बुनते ....
पर रंग तो दिखाई देते हैं न रोशनी में ..
वो उठकर रोशनी का स्विच बंद करना चाहती
पर उंगलियां फिर रंग में डूब जातीं ....
तब से उसने आँखें बंद की हुई हैं
उसकी आँखों में बंद है एक इन्द्रधनुष ...
जबकि लड़के के हाथ
अब भी उठे हैं ...
दुआएं बिखेर रहे हैं !
शनिवार, 2 जून 2012
पेशानी पर चाँद
चाँद को बस एक बार
पेशानी पर सजाया था
उमर भर का दाग हो गया ...
माथे की लकीरों में भी
इक अगन उतर आयी है .
सबके लेखे में
कहाँ होती है चाँद की रोशनी...
सारे ग्रह-नक्षत्र सही राह चल भी दें
पर चाँद की फ़सल नहीं काट पाते.
किस्मत के सितारे जो रोपने हों
तो चाँद का सीना मत खोदना
कलेजे पर लगी चोट का
अंदाज़ा तो होगा ही तुम्हें...
टांग देना चाँद को
हथेलियों से गोल करके
आसमान के ब्लैक-बोर्ड पर
लाईट हाउस सा चमकेगा
तो सितारे किस्मत की राह
ढूंढ पायें शायद ...
बुधवार, 23 मई 2012
यादों की फ्रिन्जेज़
बड़ी मुश्किल से शांत करती हूँ
सतह के पानी को ....
ऊपर से देख कर अंदाजा नहीं लगा सकते
कितने उलझे हुए हरे-नीले शैवाल है ..
कितने भंवर ..कितने तूफान हैं भीतर
मेरी इस झील के किनारे
बहुत सी दरारें हैं
कीच सी जमी हैं यहाँ यादें..
पाँव धंस जाते हैं घुटनों तक.
एक हंस रहता है वहीं..
सुर्ख चोंच वाला
गाहे बगाहे सर्र से तैर कर
पार कर लेता है सतह का सीना
देर तक लकीर का निशान रहता है वहाँ
...........................
यूँ कंकड़ न मारा करो इस शांत पानी में
जहाँ से पत्थर डुबकी लगाता है न
वही से बनती हैं ..
गोलाइयों की कुछ फ्रिन्जेज़
जब ये किनारों तक पहुँच जाती हैं न
तो वहाँ जमी यादें फिर गीली हो जाती हैं
सूखने का वक्त ही नहीं देते इन्हें .
मंगलवार, 1 मई 2012
पत्थर
एक मील का पत्थर है
कहता कुछ नहीं
दिखाता रहता है
सिर्फ़ दूरियाँ...
एक पत्थर है संगेमरमर
ताजमहल में जड़ा
महान प्रेम के बेजान सुबूत सा ...
एक पत्थर है कोयला
दर्द के अंधेरों में दबा सदियों से
छूने से उँगलियों पर चिपक जाते हैं
सियाह से कुछ कन इसके.....
एक पत्थर चकमक भी है
दावानल की पहली चिंगारी
खुद में संजोये
अपनी अगन से
सब भस्म कर देने को आतुर .....
एक और पत्थर है हीरा
तेज़ धार आरियों से
तराशे जाने को अभिशप्त
ज़ुबान पर रखने भर से
खत्म कर देता है जीवन का हर निशान....
एक और पत्थर है पारस
स्पर्श मात्र से कुंदन कर देता है
जैसे सारी पीड़ा हर के
मन को कर दे खरा सोना ....
और एक पत्थर हो तुम भी
ये सारे गुन हैं तुम में .
कहता कुछ नहीं
दिखाता रहता है
सिर्फ़ दूरियाँ...
एक पत्थर है संगेमरमर
ताजमहल में जड़ा
महान प्रेम के बेजान सुबूत सा ...
एक पत्थर है कोयला
दर्द के अंधेरों में दबा सदियों से
छूने से उँगलियों पर चिपक जाते हैं
सियाह से कुछ कन इसके.....
एक पत्थर चकमक भी है
दावानल की पहली चिंगारी
खुद में संजोये
अपनी अगन से
सब भस्म कर देने को आतुर .....
एक और पत्थर है हीरा
तेज़ धार आरियों से
तराशे जाने को अभिशप्त
ज़ुबान पर रखने भर से
खत्म कर देता है जीवन का हर निशान....
एक और पत्थर है पारस
स्पर्श मात्र से कुंदन कर देता है
जैसे सारी पीड़ा हर के
मन को कर दे खरा सोना ....
और एक पत्थर हो तुम भी
ये सारे गुन हैं तुम में .
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