
ये सड़क नहीं
धरती के सीने पर
दर्द की लकीरें हैं
जो ढूंढ रही है
दर्द का एक और सिरा.
दर्द की लकीरें हैं
जो ढूंढ रही है
दर्द का एक और सिरा.
दिन रात चलती हैं
पर न थकती हैं
न मंज़िल तक पहुँचती
है
कितने ही रहबर
...रहनुमा
रौंद कर सीना इसका
निकल जाते हैं
अपनी मंज़िल को
उन्हें पहुंचाती है
उनके मुक़ाम तक...
कुछ और हमसफ़र
साथ ले चल देती है
अनंत यात्रा को.
कितने ही शहरों-गाँवों
कस्बों-कूचों का
हाथ थाम
जोड़ देती है
कुछ टूटे सिरे,
कुछ भटकी राहें,
कुछ खोये रिश्ते
....
तुम्हारे शहर की
सरहद पर जाकर
कैसे बदल जाती है
यकायक ?
फ़ोर लेन और सिक्स
लेन के
चमचमाते रूप से
चौंधियाती
क्यूँ बदल लेती है
अपना स्वभाव ...
शायद तुम्हारे शहर
को ही
भरमा लेने की आदत है
!!






