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रविवार, 2 सितंबर 2012

दर्द की लकीरें












ये सड़क नहीं  
धरती के सीने पर
दर्द की लकीरें हैं
जो ढूंढ रही है
दर्द का एक और सिरा.

दिन रात चलती हैं
पर न थकती हैं
न मंज़िल तक पहुँचती है
कितने ही रहबर ...रहनुमा
रौंद कर सीना इसका
निकल जाते हैं
अपनी मंज़िल को
उन्हें पहुंचाती है
उनके मुक़ाम तक...
कुछ और हमसफ़र
साथ ले चल देती है
अनंत यात्रा को.

कितने ही शहरों-गाँवों
कस्बों-कूचों का
हाथ थाम
जोड़ देती है
कुछ टूटे सिरे,
कुछ भटकी राहें,
कुछ खोये रिश्ते ....

तुम्हारे शहर की
सरहद पर जाकर
कैसे बदल जाती है यकायक ?
फ़ोर लेन और सिक्स लेन के
चमचमाते रूप से चौंधियाती
क्यूँ बदल लेती है
अपना स्वभाव ...
शायद तुम्हारे शहर को ही
भरमा लेने की आदत है !!


शनिवार, 25 अगस्त 2012

बिखरी बेचैनियाँ















उमर के पूरे आँगन में
बिखरी बेचैनियों को
पकड़ कैसे सकोगे
बहुत फिसलन भरे होते हैं
बेचैनियों के हाथ
पाँव होते हैं मगर इनके ..
टहलती रहती हैं दिल के हर कोने में
और झाडती रहतीं हैं राख ..
बहुत कुछ जलाने के बाद.
लिखा हुआ मिटाने की
भरपूर कोशिश करती हैं ये
घिसने से निकली
रबड़ की बत्तियाँ
पड़ी रहती हैं यहाँ वहाँ
पर किस्मत का लेखा
मिटा कहाँ पातीं हैं कमबख्त !

गुरुवार, 23 अगस्त 2012

अपरिचय का मरुस्थल





अपरिचय का इतना बड़ा मरुस्थल
कब रच लिया तुमने
कि विदा के समय कह भी न सको
वो तीन शब्द ....
या फिर हाथ पकड़ बस देख लो
गहरी आँखों से नज़र भर ....
कही अनकही तुम्हारी बातों में
जिन शब्दों को सुनने को तरसता है मन
उन शब्दों को कैसे दोष दूं ?

सदियों की कहानी
लम्हों में कैसे जियें वो
शब्द हैं ....
कोई हम तुम थोड़े हैं
जो हाशियों में सिमट कर भी
पूरी कहानी जी लेते हों ...

शब्दों में इतनी सामर्थ्य कहाँ
वो तो सिर्फ़ तुम्हारे दिल का बोझ
ले आते हैं मुझ तक ...बेआवाज़
काश ! मौन की कोई भाषा होती
तो शायद ये अपरिचय का मरुस्थल
हम पार कर पाते
और कह पाते कि प्रेम शब्दों में नहीं
मन में जिंदा रहता है.....

शुक्रवार, 17 अगस्त 2012

नज़्म का सफ़र














वो नज़्म
जो तुम्हारी नहीं है
मगर तुम्हारे होठों से
दुहराई गयी है बार बार
और इस तरह
पा ली है उसने
जीने लायक साँसों की रफ़्तार ...

उसके लफ़्ज़ों के मानी में
बंधे हैं उन एहसासों के तार
जिनका एक सिरा
तुम्हारी उँगलियों से बंधा है
और इस तरह
हो जाती है वो कठपुतली
तुम्हारे इशारों की ...

धडकनों के सधे कदम रखती
तय कर रही है वो दूरियां
साँसों की आवाजाही से
रफ़्तार देती है
और इस तरह
तय करती है वो
उम्र का लम्बा सफ़र ...

आज उस नज़्म ने
अपनी नब्ज़ पर हाथ रखा
मद्धम सी उसकी चाल देखकर
मायूस हो गयी है
कि कैसे तय होगा
ये लम्बा सफ़र ..ये दूरियां
इस धीमी रफ़्तार से  

गुरुवार, 16 अगस्त 2012

रोशनी का इंतज़ार
















कभी भोगा है अँधेरे में रहते हुए
सदियों तक रोशनी का इंतज़ार
जैसे भूल गया हो आना सूरज
धरती के इस गोलार्ध में ...
दूसरे हिस्से में रोज़ होतीं हैं सुबहें
रोज़ दिन चढ़ता है ...
रोशन हो जाती हैं वो सारी राहें
जिन पर नेह का मुसाफ़िर
सफ़र जल्दी जल्दी तय करता है
मगर अंधेरो की सारी राहें भी
अंधेरों पर ही ख़त्म होती हैं

नेह की बेलों को बढ़ने के लिए
थोड़ी तो धूप की दरकार होगी
नहीं पहुँचती बेलों की बाहें भी
रोशनी के उस गोलार्ध तक
कि ले सकें थोड़ा ताप, थोड़ी ऊर्जा
अंधेरों में भी जीते रहने के लिए
और बाँधने के लिए मज़बूती से
खंडित अस्तित्व के टुकड़े ...
गले तक अंधेरों में डूबे रहने से
सांस भी नहीं आती ठीक से .......
क्यूँ नहीं निकलता सूरज इस ओर
ये जानते हुए भी कि
धूप से ज़ख्म भी सूख जाते हैं
और उनका गीलापन भी .

सोमवार, 13 अगस्त 2012

दो झीलें

 









आँखों की
दो छोटी झीलों में
भर रखा है
थोड़ा खारा जल ....
दर्द का
इतना ताप मत देना
कि सूख कर
बंजर हो जाए
सपनों की
मेरी ये ज़मीं ...........


बुधवार, 8 अगस्त 2012

एक रिश्ता ...एक अमूल्य निधि

तुम बिखरो ..
तो समेट लूंगी
हर तिनका तुम्हारा ....
हर बिखरे तार से बुन दूँगी
एक नया रिश्ता ....
हर कतरे से
एक नया खज़ाना गढ़ लूंगी
हर बहके भाव को
डपट कर ले आऊंगी
तुम्हारी हर अमानत
सौंप दूँगी तुम्हें
......
बिखरना मत मेरी जान
क्योंकि तुम सलामत हो
तो सलामत हैं
मेरी दोस्ती की निधि
तुम साथ होगी तो
एक बार फिर बाँट लेंगे
तनहाइयों के लम्हे
दुःख के कतरों को
चिंदी चिंदी कर
उडा देंगे,फूंक मार कर
और जी लेंगे
खुशियों के उन पलों को
जो बुलबुलों की तरह
उड़ जाते हैं
यदि जिए न जाएँ ...




कुछ चित्र ये भी