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बुधवार, 23 मई 2012

यादों की फ्रिन्जेज़


















बड़ी मुश्किल से शांत करती हूँ
सतह के पानी को ....
ऊपर से देख कर अंदाजा नहीं लगा सकते
कितने उलझे हुए हरे-नीले शैवाल है ..
कितने भंवर ..कितने तूफान हैं भीतर
मेरी इस झील के किनारे
बहुत सी दरारें हैं
कीच सी जमी हैं यहाँ यादें..
पाँव धंस जाते हैं घुटनों तक.

एक हंस रहता है वहीं..
सुर्ख चोंच वाला
गाहे बगाहे सर्र से तैर कर
पार कर लेता है सतह का सीना
देर तक लकीर का निशान रहता है वहाँ
...........................
यूँ कंकड़ न मारा करो इस शांत पानी में
जहाँ से पत्थर डुबकी लगाता है न
वही से बनती हैं ..
गोलाइयों की कुछ फ्रिन्जेज़
जब ये किनारों तक पहुँच जाती हैं न
तो वहाँ जमी यादें फिर गीली हो जाती हैं
सूखने का वक्त ही नहीं देते इन्हें .

मंगलवार, 1 मई 2012

पत्थर

एक मील का पत्थर है
कहता कुछ नहीं
दिखाता रहता है 
सिर्फ़ दूरियाँ...

एक पत्थर है संगेमरमर 
ताजमहल में जड़ा
महान प्रेम के बेजान सुबूत सा ...

एक पत्थर है कोयला 
दर्द के अंधेरों में दबा सदियों से 
छूने से उँगलियों पर चिपक जाते हैं 
सियाह से कुछ कन इसके.....

एक  पत्थर चकमक भी है 
दावानल की पहली चिंगारी 
खुद में संजोये 
अपनी अगन से 
सब भस्म कर देने को आतुर .....

एक और पत्थर है हीरा 
तेज़ धार आरियों से 
तराशे जाने को अभिशप्त 
ज़ुबान पर रखने भर से 
खत्म कर देता है जीवन का हर निशान....

एक और पत्थर है पारस 
स्पर्श मात्र से कुंदन कर देता है 
जैसे सारी पीड़ा हर के 
मन को कर दे खरा सोना ....

और एक पत्थर हो तुम भी 
ये सारे गुन हैं तुम में .



शुक्रवार, 20 अप्रैल 2012

वजह जीने की


















   

कुछ वजहें जीने की
आस पास बिखेर रखी हैं
दिखती हैं, सुनाई देतीं हैं
तो लगता है ज़िंदा हूँ मैं .

सजा रखी हैं कुछ शोकेस में
सजावटी सामान की तरह
जैसे बेजान, बेवजह सी
खूबसूरत चीज़ें भी तो
होतीं हैं वजह जीने की .
कुछ रखी हैं बुकशेल्फ़ में
किताबों के पन्नों के बीच दबी
अक्षर अक्षर महकती सी ...
बेजान अक्षरों के मानी भी
होते हैं कभी कभी ..वजह जीने की .

कुछ को ओढती हूँ बिछाती हूँ
पहनती हूँ खाल के नीचे
मांस और लहू से चिपकी हैं वो
उतारने पर दर्द होता है असहनीय ..
इश्क़ एक बार पहन कर
उतारा नहीं जा सकता.
इश्क़ न हुआ,
कोई हरी बूटी हो गयी
मुश्किलों के सिलबट्टे पर पिसी
भरोसे की छन्नी में छनी
घुली हुई भंग की तरह
पीते रहो उम्र भर घूँट घूँट..
जीने का सामान ऐसा भी तो होता है .

शुक्रवार, 13 अप्रैल 2012

खामोशियों की उम्मीद























आज फिर मेरी खामोशियाँ..
तुम्हें छूकर
खामोश ही लौट आयी हैं.
कितने सवाल कर चुकी हूँ ...
कितने उलाहने दे चुकी हूँ ...
हर तरह टटोल भी लिया है
मगर खामोशियाँ बोली हैं कभी
जो बोलेंगी ,

इक उम्मीद ओढाई थी मैंने उन्हें
तुम देख नहीं पाए शायद
लौट आई हैं वो नाउम्मीद होकर.
इतना तो जानती हूँ कि
खामोश उम्मीदें
गहरी उदासियों के पार नहीं जा सकती
नहीं सहला सकतीं उस दर्द को
जो पल रहा है बरसों से.

मेरी खामोशियों पर
अपनी आवाज़ के
कुछ कतरे ही चिपका देते...
मेरे दर्द को कुछ तो सांस आती..
वरना दम घुटता है
दर्द का भी .

बुधवार, 4 अप्रैल 2012

बूमरैंग


















लड़की
बरसों से पचकुट्टे खेलती
हवा में उछालती
फिर हसरत से तकती
कोई गिट्टा ..
कोई पत्थर तो लाएगा
तोड़कर उसका आसमान .
पर लौट आते गिट्टे
उसकी हसरतों की तरह
खाली हाथ ...

आज विज्ञान पढ़ लिया है उसने
जानती है लड़की
कि गोलाकार वस्तु पर
गुरुत्व और घर्षण बल
सबसे कम लगता है ..इसलिए
आज उस लड़की ने
अपनी हसरतों की
छोटी और गोल गेंद
हवा में उछाली है
उहूँ .. हवा में नहीं
और ऊपर आसमान में.
पर आसमान भी हड़प गया
साजिशन ..उसकी गेंद

तकती आँखों में
बेबसी नहीं
हौसला रखती है वो ..
अब वो बूमरैंग बनाएगी
समेटेगी अपना पूरा जोश 
और पूरे आक्रोश का बल
अपने बाजुओं में ..
फिर फेंकेगी बूमरैंग पूरे जोर से
अभिमानी आकाश की ओर..
जो वापस आएगा
उतनी ही तेज़ी से
लौट कर उसके पास
साधकर लक्ष्य ..
लेकर उसके अपने हिस्से का
एक कतरा आसमान
और अंजुरी भर दुनिया .

सोमवार, 2 अप्रैल 2012

हुनर ...जुलाहे का

















मन की तकली पर
यादों का सूत
अनवरत काता है ..
टीसती रही उंगलियां
लहूलुहान होते रहे पोरें
कताई भी होती रही
तीव्र से तीव्रतर ..
देखो न ..
उँगलियों से रिसे रक्त ने
अनायास ही
पूनियों को रंग दिया है
तुम्हारे ही रंग में

प्रीत ने जुलाहे का हुनर

तो सिखा ही दिया है
मैंने भी दिल के करघे पर
चढा दी हैं
काते हुए सूत की पूनियां
धडकन की लय पर
बुनूँगी ताना बाना
धक धक.. धक धक
इस लय ताल में

आती जाती हर सांस में
सिमरूंगी तुम्हारा भी नाम
जिसके असर से
मेरी बुनी काली कमरिया भी
हो उठेगी आरक्त ..
तुम सी .

गुरुवार, 29 मार्च 2012

मेरी आँखों के ख्वाब





कितने ही ख्वाबों को 
यादों की जिल्द लगा 
पलकों की कोरों पर 
करीने से सहेजा है ...
जैसे  अलमारी में 
किताबें सजाता है कोई .

कितने ही ख्वाबों को 
ताकीद की गिरह से बाँध 
मन के खूंटे से 
बाँध दिया है कस के ...
जैसे पगहे में 
गाय बांधता है कोई .

कुछ  सुर्ख-सियाह ख्वाब
ऐसे भी हैं बेचारे
जिन्हें हरदम बुनती रहती हूँ ..
जैसे ऊन सलाई और फंदों से
डिज़ाइन बुनता है कोई .

कुछ ख्वाबों को डालकर 
अक्सर भूल जाती हूँ 
तकिये के नीचे ..
चादर की तहों में ..
राशन की रसीदों की पीठ पर 
या डायरी के पन्नों में .

कुछ चलते ही रहते हैं 
फिल्म की तरह आँखों में
बिना इंटरवल ब्रेक के ...
कुछ डेली सोप की शक्ल 
अख्तियार कर लेते हैं ...
रोज आते हैं, बिला नागा 
तयशुदा वक्त पर दस्तक देने .

मेरी आँखों में 
ख्वाबों का recurring deposit है 
ऊपर वाला इन खातों पर 
maturity date डालना 
भूल गया है .



कुछ चित्र ये भी