"एक मुकम्मल तस्वीर बनाने की चाहत में ..... झरते हैं कुछ रंग ....घुलती हैं कुछ भावनाएं ..सिमट जाते हैं कुछ स्वप्न ...यही है ..मन के कैनवस पर तूलिका के शब्द-रंग "
बुधवार, 5 दिसंबर 2012
खाली काग़ज़
सारी रात.......
शब्द बुने...अर्थ गढ़े
दिन के उजाले मे
कुछ मानी तलाशे
और फिर.....
शाम की हथेली पर
बस खाली काग़ज़ रख दिया
....................
क्या वो नज़र
पढ़ पाएगी ये अफ़साना ?
,
जवाब देंहटाएंपढ़ लिया सब निधि .... समझ गयी :)
जवाब देंहटाएंखाली कागज़ पढने और पढ़ाने की सीमा से बाहर ...
जवाब देंहटाएं
जवाब देंहटाएंशाम की हथेली पर
बस खाली काग़ज़ रख दिया
....................
क्या वो नज़र
पढ़ पाएगी ये अफ़साना ?
अवश्य वो नज़र
पढ़ पाई होगी ये अफ़साना तूलिका जी
:)
बेहतरीन !
कमाल की संवेदनशीलता !
वाऽह ! वाऽऽह !! वाऽऽऽह !!!
शुभकामनाओं सहित…
http://www.parikalpnaa.com/2012/12/blog-post_29.html
जवाब देंहटाएंआपि किस रचना को कविता मंच पर साँझा किया गया है
जवाब देंहटाएंसंजय भास्कर
कविता मंच
http://kavita-manch.blogspot.in