मन की तकली पर
अनवरत काता है ..
टीसती रही उंगलियां
लहूलुहान होते रहे पोरें
कताई भी होती रही
तीव्र से तीव्रतर ..
देखो न ..
उँगलियों से रिसे रक्त ने
अनायास ही
पूनियों को रंग दिया है
तुम्हारे ही रंग में
प्रीत ने जुलाहे का हुनर
तो सिखा ही दिया है
मैंने भी दिल के करघे पर
चढा दी हैं
काते हुए सूत की पूनियां
धडकन की लय पर
बुनूँगी ताना बाना
धक धक.. धक धक
इस लय ताल में
आती जाती हर सांस में
सिमरूंगी तुम्हारा भी नाम
जिसके असर से
मेरी बुनी काली कमरिया भी
हो उठेगी आरक्त ..
तुम सी .
सिमरूंगी तुम्हारा भी नाम
जिसके असर से
मेरी बुनी काली कमरिया भी
हो उठेगी आरक्त ..
तुम सी .






