शनिवार, 28 जनवरी 2012

चंपा ....मेरी सखी!

धूप का एक छोटा सा कतरा ...ज़मीन पर चुपचाप खड़ा  .....शायद देखने आया था कि शीत ने कितने ज़र्द पत्ते अपनी शाखों से जुदा किये हैं ....गुनगुनी सेंक की थोड़ी आस लिए पास चली आई मैं ...पीठ पर जैसे ही गर्माहट ने असर दिखाया तो कन्धों का दर्द महसूस होने लगा ...उसी से निजात पाने के लिए गर्दन ऊपर की थी मैंने ...अनमना.. उदास मन वहीँ अटक गया .....अरे! ये तो चंपा का वही पेड़ है ...जिसके फूलों की खुशबू मेरी यादों में बसती है ....उस एक पल की अनुभूति बाँटना चाहती हूँ ..............

चंपा ....मेरी सखी!
तुम्हें देख आकुल हूँ ...
विह्वल हूँ....
दुःसह शीत की पीड़ा ने
खींच लिया है हर आवरण
तुम्हारे सौंदर्य का..
छीन ली है तुमसे..
तुम्हारी पहचान.
सूख कर झर गये हैं..
हरियाए तुम्हारे पत्ते.
तुम्हारी सुगंध से महकता
विशिष्ट होने का परिचय देता
वो श्वेत पुष्प भी
तुमने आज नहीं पहना.
पत्रविहीन... पुष्पविहीन..
तुम्हारा तन ..तुम्हारी शाखें
और अपने अवशेषों के ढेर पर खड़ी तुम.....
जोगनसी ...बिरहन सी
खड़ी हो हाथ उठाए..
मानो प्रीत का हर ओस कन
समेट लोगी अंचल मे.
तुम्हारी शाखों मे ..
मेरे हाथों सी उंगलियाँ हैं
जिसकी पोरें अँखुआ गयी हैं
शीत के इस विरह के बाद
जब ऋतुराज आएगा.....
ये अंकुर फूटेंगे ..
भर उठोगी तुम हरीतिमा से.
तुम्हारी उँगलियों से ..
फिर झरेंगे फूल...
फिर बिखरेगी सुगंध ||

8 टिप्‍पणियां:

  1. सकारात्मक सोच से ओत-प्रोत,सुन्दर शब्द संयोजन और सरल स्फुटित भावों से युक्त रचना हेतु बधाई स्वीकार करो...
    ब्लॉग पर पहली पहल रचना ...वो भी बसंत के दिन ...इससे अच्छा दिन प्रारम्भ का नहीं हो सकता था.

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    1. निधि ये ब्लॉग मेरे प्रयास से ज़्यादा ..तुम्हारी प्रेरणा है...तुमसे इतनी सकारात्मक टिप्पणी पाकर गौरवान्वित भी हूँ ..अभिभूत भी

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  2. सुंदर रचना किन्तु उससे भी सुंदर कविता की काव्यात्मक भूमिका और सबसे सुंदर आपके प्रोफाइल का इंट्रो.

    उस प्रिज्म के मिलने की शुभकामनाएँ...

    माँ शारदे को नमन.

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    1. मीनू दी! मेरे प्रोफाइल के इंट्रो को आपसे बेहतर कौन समझ सकता है.....प्रिज़्म सा बन पाऊँ तो सौभाग्य मानूँगी अपना ......आप अपने आशीर्वाद और स्नेह का हाथ फिर से रख दीजिए ना मेरे सर पर

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  3. सुन्दर रचना के साथ नए ब्लॉग की बधाई तुलिका जी

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  4. सरोज जी! आभारी हूँ ...मार्गदर्शन करते रहिएगा यूँ ही

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  5. चंपा ....मेरी सखी!
    तुम्हें देख आकुल हूँ ...
    विह्वल हूँ....
    दुःसह शीत की पीड़ा ने
    खींच लिया है हर आवरण
    बहुत हि सुन्दर भावों को प्रभावी शब्द दिए हैं आपने.खूबसूरत रचना.

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    1. संजय जी, मेरे प्रयास आपको पसंद आ रहे है .....शुक्रिया इस हौसला अफजाई का

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