शुक्रवार, 20 अप्रैल 2012

वजह जीने की


















   

कुछ वजहें जीने की
आस पास बिखेर रखी हैं
दिखती हैं, सुनाई देतीं हैं
तो लगता है ज़िंदा हूँ मैं .

सजा रखी हैं कुछ शोकेस में
सजावटी सामान की तरह
जैसे बेजान, बेवजह सी
खूबसूरत चीज़ें भी तो
होतीं हैं वजह जीने की .
कुछ रखी हैं बुकशेल्फ़ में
किताबों के पन्नों के बीच दबी
अक्षर अक्षर महकती सी ...
बेजान अक्षरों के मानी भी
होते हैं कभी कभी ..वजह जीने की .

कुछ को ओढती हूँ बिछाती हूँ
पहनती हूँ खाल के नीचे
मांस और लहू से चिपकी हैं वो
उतारने पर दर्द होता है असहनीय ..
इश्क़ एक बार पहन कर
उतारा नहीं जा सकता.
इश्क़ न हुआ,
कोई हरी बूटी हो गयी
मुश्किलों के सिलबट्टे पर पिसी
भरोसे की छन्नी में छनी
घुली हुई भंग की तरह
पीते रहो उम्र भर घूँट घूँट..
जीने का सामान ऐसा भी तो होता है .

शुक्रवार, 13 अप्रैल 2012

खामोशियों की उम्मीद























आज फिर मेरी खामोशियाँ..
तुम्हें छूकर
खामोश ही लौट आयी हैं.
कितने सवाल कर चुकी हूँ ...
कितने उलाहने दे चुकी हूँ ...
हर तरह टटोल भी लिया है
मगर खामोशियाँ बोली हैं कभी
जो बोलेंगी ,

इक उम्मीद ओढाई थी मैंने उन्हें
तुम देख नहीं पाए शायद
लौट आई हैं वो नाउम्मीद होकर.
इतना तो जानती हूँ कि
खामोश उम्मीदें
गहरी उदासियों के पार नहीं जा सकती
नहीं सहला सकतीं उस दर्द को
जो पल रहा है बरसों से.

मेरी खामोशियों पर
अपनी आवाज़ के
कुछ कतरे ही चिपका देते...
मेरे दर्द को कुछ तो सांस आती..
वरना दम घुटता है
दर्द का भी .

बुधवार, 4 अप्रैल 2012

बूमरैंग


















लड़की
बरसों से पचकुट्टे खेलती
हवा में उछालती
फिर हसरत से तकती
कोई गिट्टा ..
कोई पत्थर तो लाएगा
तोड़कर उसका आसमान .
पर लौट आते गिट्टे
उसकी हसरतों की तरह
खाली हाथ ...

आज विज्ञान पढ़ लिया है उसने
जानती है लड़की
कि गोलाकार वस्तु पर
गुरुत्व और घर्षण बल
सबसे कम लगता है ..इसलिए
आज उस लड़की ने
अपनी हसरतों की
छोटी और गोल गेंद
हवा में उछाली है
उहूँ .. हवा में नहीं
और ऊपर आसमान में.
पर आसमान भी हड़प गया
साजिशन ..उसकी गेंद

तकती आँखों में
बेबसी नहीं
हौसला रखती है वो ..
अब वो बूमरैंग बनाएगी
समेटेगी अपना पूरा जोश 
और पूरे आक्रोश का बल
अपने बाजुओं में ..
फिर फेंकेगी बूमरैंग पूरे जोर से
अभिमानी आकाश की ओर..
जो वापस आएगा
उतनी ही तेज़ी से
लौट कर उसके पास
साधकर लक्ष्य ..
लेकर उसके अपने हिस्से का
एक कतरा आसमान
और अंजुरी भर दुनिया .

सोमवार, 2 अप्रैल 2012

हुनर ...जुलाहे का

















मन की तकली पर
यादों का सूत
अनवरत काता है ..
टीसती रही उंगलियां
लहूलुहान होते रहे पोरें
कताई भी होती रही
तीव्र से तीव्रतर ..
देखो न ..
उँगलियों से रिसे रक्त ने
अनायास ही
पूनियों को रंग दिया है
तुम्हारे ही रंग में

प्रीत ने जुलाहे का हुनर

तो सिखा ही दिया है
मैंने भी दिल के करघे पर
चढा दी हैं
काते हुए सूत की पूनियां
धडकन की लय पर
बुनूँगी ताना बाना
धक धक.. धक धक
इस लय ताल में

आती जाती हर सांस में
सिमरूंगी तुम्हारा भी नाम
जिसके असर से
मेरी बुनी काली कमरिया भी
हो उठेगी आरक्त ..
तुम सी .

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