मंगलवार, 11 सितंबर 2012

उत्परिवर्तन















उसके पांवों के नीचे
सख्त रास्ता नहीं था
उसकी जगह ले चुकी थी
एक तीव्र प्रवाहमयी नदी ...
धारा के विपरीत तैरने
और शिखर तक पहुँचने की जिद में
बाजुओं ने पाल ली थीं मछलियाँ
ये उसके स्व का विस्तार था
उत्परिवर्तन था उसकी काया का ...
पांवों में बंधे चप्पुओं को
मालूम थी ये बात
कि कोई नाविक ..कोई बेड़ा
नहीं आएगा आस पास
जो हर सके स्पर्श मात्र से
थोड़ा जीवन संघर्ष, उसके हिस्से का ...
फेफड़े पवन चक्की से चलते
साँसों की रफ़्तार से जलाते रहे
देह का कोयला ...

शिखर विस्फारित नेत्रों से देख रहा था
उस अंगार को ....

18 टिप्‍पणियां:

  1. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  2. और शिखर तक पहुँचने की जिद में
    बाजुओं ने पाल ली थीं मछलियाँ
    ये उसके स्व का विस्तार था
    उत्परिवर्तन था उसकी काया का ...

    waah! khubsurat!!
    Mere blog ; http://kpk-vichar.blogspot.in par bhi aiye aur apni rai den,aabhari hounga.

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. बहुत शुक्रिया कालीपद जी ...आपके ब्लॉग पर भी आती हूँ

      हटाएं
  3. सच कहा ...
    आत्मविश्वास ही "सब कुछ" है

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत ही प्रेरक रचना ......अद्भुत जिजीविषा ....!!!

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. सरस जी ..जीवन एक अदम्य जिजीविषा ही तो है

      हटाएं
  5. हर जीवन का संघर्ष उसका अपना है ..अदम्य जिजीविषा भी अपनी ...तीव्र प्रवाह है भावों का ..शिखर को विस्फारित नेत्रों से देखना ही था ..

    उत्तर देंहटाएं
  6. पांवों में बंधे चप्पुओं को
    मालूम थी ये बात
    कि कोई नाविक ..कोई बेड़ा
    नहीं आएगा आस पास
    जो हर सके स्पर्श मात्र से
    थोड़ा जीवन संघर्ष, उसके हिस्से का ...
    बहुत-बहुत, सुन्दर भाव ...

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. मेरी अनुभूतियों ने आपके ह्रदय को स्पर्श भी किया हो तो उसका आभार

      हटाएं
  7. तूलिका...तुम्हारे लिखे की पहचान...बिम्बों की लड़ियाँ एक दूसरे में गुंथ जाती हैं ...एक से दूसरा बिम्ब विस्तार पाता है .
    कविता पढ़ते हुए ...एहसास हो जाता है कि मनुष्य को अपनी जिजीविषा किसी हाल में नहीं खोनी चाहिए .सकारात्मक कविता!उत्परिवर्तन के सिद्धांत को समझाती हुई.
    पढ़ते हुए ...आँखों के आगे एक चित्र आ जाता है.....एक तैराक का
    जिसके बाजुओं ने पाल ली थीं मछलियाँ लगातार मेहनत के कारण

    पांवों में बंधे चप्पुओं को
    मालूम थी ये बात
    कि कोई नाविक ..कोई बेड़ा
    नहीं आएगा आस पास.....
    जो हर सके स्पर्श मात्र से
    थोड़ा जीवन संघर्ष, उसके हिस्से का ...पर वो हार नहीं मानेंगे ...पैर चलेंगे ..जब तक़ मंज़िल तक नहीं पहुँचते

    फेफड़े पवन चक्की से चलते.....हांफना हार का नहीं...जीत के पास होने को बता रहा है .

    साँसों की रफ़्तार से जलाते रहे
    देह का कोयला ...यह देह जल कर ही हीरा बनेगी....निस्संदेह .

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. ये तुम्हारा अपरिमित स्नेह है जो मेरा लिखा सब कुछ समझ भी लेती हो और तारीफ़ भी कर लेती हो ...हाँ ! ये सब कुछ सकारात्मक लिखा ....जिजीविषा लिखी ...संघर्ष से हुआ परिवर्तन लिखा ...
      ....
      तेरी एक एक बात अपनी बात को संबल देती हुई लगी
      हांफना हार का नहीं...जीत के पास होने को बता रहा है ....सच ये बात बहुत अच्छी लगी ...

      हटाएं
  8. तूलिका...तुम्हारे लिखे की पहचान...बिम्बों की लड़ियाँ एक दूसरे में गुंथ जाती हैं ...एक से दूसरा बिम्ब विस्तार पाता है .
    कविता पढ़ते हुए ...एहसास हो जाता है कि मनुष्य को अपनी जिजीविषा किसी हाल में नहीं खोनी चाहिए .सकारात्मक कविता!उत्परिवर्तन के सिद्धांत को समझाती हुई.
    पढ़ते हुए ...आँखों के आगे एक चित्र आ जाता है.....एक तैराक का
    जिसके बाजुओं ने पाल ली थीं मछलियाँ लगातार मेहनत के कारण

    पांवों में बंधे चप्पुओं को
    मालूम थी ये बात
    कि कोई नाविक ..कोई बेड़ा
    नहीं आएगा आस पास.....
    जो हर सके स्पर्श मात्र से
    थोड़ा जीवन संघर्ष, उसके हिस्से का ...पर वो हार नहीं मानेंगे ...पैर चलेंगे ..जब तक़ मंज़िल तक नहीं पहुँचते

    फेफड़े पवन चक्की से चलते.....हांफना हार का नहीं...जीत के पास होने को बता रहा है .

    साँसों की रफ़्तार से जलाते रहे
    देह का कोयला ...यह देह जल कर ही हीरा बनेगी....निस्संदेह .

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. दूसरी बार में .... :)
      खूब सा स्नेह

      हटाएं
  9. हाँ सासों की धौंकनी
    और देह को कोयला करना ही यदि मान के शिखर तक पंहुचने की आवश्यक शर्त है ..तो ये कीमत चुकाई जानी चाहिए..

    उत्तर देंहटाएं

कुछ चित्र ये भी