रविवार, 5 फ़रवरी 2012

एक लकीर प्यार की

रोपा था हथेली पर
एक बीज...
सोचा था ...हाथ की लकीरों में
उगेगी एक लकीर प्यार की
बढ़ते बढ़ते पहुँच जाएगी
तुम्हारे हाथों तक ..
एक साल ऐसा अकाल पड़ा
..सब लकीरें सूख गयीं
वो सब ...जो हरी थीं
कई मौसम बदले ..
कई बरसातें आयीं
कितने साल गुज़र गए
कितने ही नए बीज आकर
पड़ गए हथेली पर
अपने आप निकल आयीं
आड़ी-टेढ़ी बेतरतीब सी
कितनी ही लकीरें ...
उलझी-सिमटी ..हलकी-गहरी
जिंदगी की तरह ...
मगर अचानक ,
कोई शुभ नक्षत्र आकर
सहला गया ..सींच गया मेरी हथेली .
हरिया गयी है वो प्यार की लकीर ..
और तत्पर है ..
प्रेम की अमर बेल होने को ||

8 टिप्‍पणियां:

  1. सारी उम्र जिस शख्स को पाने की चाह रही
    उस के नाम की लकीर मेरे हाथों में नहीं थी


    जीवन में जब प्यार आता है ...क्या क्या साथ लेकर आता है.कितनी आशाएं..कितनी मिठास ..सब साथ आती हैं.प्रेम जब हरियाता है तो उसको बढ़ने से ,महकने से कोई नहीं रोक पाता.
    कुछ लोगों के नसीब में...हाथ की रेखाओं में प्यार नहीं होता ...कितने बदनसीब होते होंगे न,वो लोग.प्यार होना ही महत्त्वपूर्ण है..मिलना बिछडना नहीं.उस एहसास का एक लम्हा भी ज़िंदगी के सारे लम्हों पर भारी रहता है .
    तूलिका ...तुम लिखती हो मुझे तुम्हारा लिखा कहीं अंदर तक जैसे छू जाता है.काश ,सबके जीवन में ,ये....लकीर प्रेम की ...प्यार की अमर लता होके महके- महकाए.

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    1. .
      हम जिसे जी रहे हैं वो लम्हा
      हर गुज़िश्ता सदी पे भारी है
      सच है न निधि ...लकीरों में सब कुछ नहीं होता..जैसे मुकद्दर में सब नहीं होता ....मगर कुछ लकीरें हल्की और कुछ गहरी ज़रूर होती हैं ....मेरा लिखा तुम्हे अन्दर तक छूता है जान कर इसलिए अच्छा लगा क्योंकि तुम्हारा लिखा पढ़कर मुझे भी कुछ ऐसा ही लगता है

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  2. सुन्दर भावपूर्ण रचना तुलिका जी

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    1. सरोज जी पसंद करने का शुक्रिया

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  3. ..सब लकीरें सूख गयीं
    वो सब ...जो हरी थीं
    कई मौसम बदले ..
    बेहद गहरे अर्थों को समेटती खूबसूरत और संवेदनशील रचना. आभार.

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    1. संवेदना साझा करने का शुक्रिया संजय जी

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