बुधवार, 8 फ़रवरी 2012

आ जाओ



खामोश है सारी कायनात
कुछ बोल दो
लब खोल दो
तो सब गुनगुना उठें

इत्र चुक गया है
खुश्बुएं गुम हैं
एक बार आ जाओ
तो सारा शहर महक उठे

ठंडा पड़ गया है प्रेम परबत
थोड़ी सी उष्मा दो
सब पिघल जाए
सागर मे मिल जाए...........

4 टिप्‍पणियां:

  1. जिसे एक आवाज़ में आना होता...वो छोड़ के ही क्यूँ जाता???खैर ,
    कुछ लोग होते हैं ना....जिनके होने भर से जीवन में रंग भर जाते हैं.
    यार यह प्रेम परबत ठंडा कैसे होता है,मुझे भी बताना....बड़ी ज़रूरत है .सीधी सी बात कम शब्दों में कह डाली है,तुमने.

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    1. प्रेम तो परबत सा है .....वक़्त की बर्फ पड़ी है बस .....दुःख कहीं नीचे दब गए है ...अन्दर की आग कहीं ज्वालामुखी न बन जाये ....इसलिए बाहर से प्रेम की ऊष्मा तो चाहिए न ...

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  2. थोड़ी सी ऊष्मा दो .... प्रेम की ऊष्मा .... बहुत खूब ...

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    1. हाँ रश्मि ! प्रेम कि ऊष्मा ...थोड़ी सी

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