मंगलवार, 21 फ़रवरी 2012

दुरूह हूँ ........



मुझ तक पहुँचने के लिए...

तुम्हे पीर के पर्वत पर अनवरत चढ़ना होगा
दुखों के गहरे गह्वर को फर्लांग तो पाओगे?

निराशा की अंधेरी कंदराएँ  भटका देंगी तुम्हें
झरनों के चीखते सन्नाटो से डर तो न जाओगे?

विरह के सघन वनो का  विस्तार भी मिलेगा
एकांत के जलते मरुथल मे नंगे पाँव चल पाओगे?

मूसलाधार बरसती उन्मत्त आँखों मे कई बार डूबोगे
प्रेम की प्रचंड उद्दाम बहती नदी मे तैर पाओगे?

हाँ! इतनी आसान नहीं हूँ मैं, जितनी दिखती हूँ
दुरूह हूँ .........दुर्गम हूँ!!

8 टिप्‍पणियां:

  1. विरह के सघन वनो का विस्तार भी मिलेगा
    एकांत के जलते मरुथल मे नंगे पाँव चल पाओगे?

    बहुत खूब !

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    1. KC हाँ ये सभी प्रेम की मेरी परिभाषाएँ हैं.... प्रोत्साहन के लिए आभार...

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  2. vaise toh kai baar dekha hai jujharoopan tumhara
    darti hoon par, ki apnon se na joojh paaoge..

    han itni aasaan nahi hoon main.. paramparaaon se bhi pare...
    duroooh hoon main.... durgam hoon!!!

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    1. श्रीकीर्ति ..स्वागत है आपका ....आपने मेरी कविता को पूरा कर दिया ....धन्यवाद

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  3. @ तूलिका ..... आज ये स्वीकार करती हूँ कि कई बार तुम्हारी कविताओं से मैं कतरा के निकल जाती हूँ !.... और इसमें दोष तुम्हारी काव्य प्रतिभा का नहीं....मेरा है !
    तुम्हारी कवितायें तो अद्भुत ही होतीं हैं ......जीवंत......सप्राण.....सचेतन !
    ये गातीं हैं.....गुनगुनातीं हैं !.....हंसतीं हैं ....खिलखिलातीं हैं !
    ये उदास होतीं हैं......रूठ जातीं हैं !.....
    कभी असहज प्रश्नों से उद्वेलित करतीं हैं.......कभी विद्रोह में ललकारती हैं
    मन की सोयी ....अधमुंदी आँखों को ....वास्तविकता के ठन्डे छीटों से अप्रतिभ कर देतीं हैं !.......
    सहम जातीं हूँ मैं ....हर बार...और फिर घबरा के कतराती हूँ उनसे !...
    लेकिन ये भी तो सच है......... जो हमें उद्वेलित कर सके ......वही साहित्य शिव भी होता है....कालजयी भी होता है !

    बहुत ही सीधी सच्ची बात....बहुत ही सीधे सरल शब्दों में......
    नारी हो तुम.......... साक्षात प्रेम हो !
    और प्रेम तक पहुँचने के लिए ...... बहुत कुछ उत्सर्ग करना पड़ता है......" सूली ऊपर सेज पिया की .....किस विधि मिलना होय "......
    प्रेम की तो बस एक ही शर्त है......... और कबीर से बेहतर उसे कोई समझ नहीं सका...

    "यह तो घर है प्रेम का खाला का घर नाहिं
    सीस उतारे भुई धरे तब पैठे घर मांहीं !"

    हाँ ! तो सच ही तो कहा तुमने........पीर के पर्वत पर अनवरत चढ़ना होगा.......दुखों के गहरे गह्वर को फलाँगना होगा....... निराशा की अंधेरी कन्दराएँ भटका देंगी........झरनों के चीखते सन्नाटे भी बहुत डरायेंगे.....

    बड़ी आज़माइश का रास्ता है ये.....
    प्रेम तुम्हें ठोकेगा-बजाएगा .....पटकेगा-गिराएगा ....बार बार देखेगा कि अभी तुम्हारी गागर धूप में तप के......मज़बूत हुई कि नहीं ?.....
    अभी सोना आग में पूरी तरह गल के निखरा कि नहीं ?........अभी तुमने अपनी आस्था के यज्ञ में.....अपने 'स्व' की पूर्णाहुति दी कि नहीं ? .....
    अहंकार की समिधा पूरी तरह भस्म हुई कि नहीं ?

    तुम प्रेम चाहते हो....तो प्रेम भी के योग्य भी बनना होगा.......क्योंकि प्रेम केवल पात्र को ही मिल सकता है !
    तुम चाहते हो अमृत को....लेकिन तुम्हारा पात्र अमृत सम्हालने के योग्य नहीं !
    तुम चाहते तो विराट को हो ...... लेकिन तुम्हारे ह्रदय में स्थान तो क्षुद्र के लिए भी नहीं !
    इसलिए पहले स्वयं को तैयार करना होगा......तब कहीं प्रेम उतरेगा जीवन में !....... भरेगा तुम्हारे पात्र में !........ तब कहीं हवन सम्पूर्ण होगा ! .....आह्वाहन हो पायेगा ईष्ट का !

    एक बार गुरुदेव रविन्द्रनाथ से किसीने पूछा था .." आपने इतने गीत लिखे - छः हज़ार - कैसे आप कर पाए ?"
    गुरुदेव ने कहा .." यह कहो मत कि मैंने लिखे ! जब तक मैं रहता हूँ तब तक तो गीत उतरता ही नहीं ! कभी-कभार जब मैं खो जाता हूँ - तब गीत उतरता है !"
    फिर एक दिन वह सज्जन किसी कार्यवश गुरुदेव के आश्रम पहुंचे.....गुरुदेव ने वहाँ उपस्थित सब लोगों के लिए चाय बनायी ( ये कार्य वो स्वयं करते थे ) ! चाय सबको दी ....अपनी प्याली हाथ में ली .....और तभी उनकी आँखें बंद हो गयीं....बाकी सब लोग चुपचाप कमरे से निकल गए...पर वो सज्जन किवाड़ की आड़ से गुरुदेव को देखते रहे....
    गुरुदेव का जैसे रूपांतरण हो गया.... उनकी आँखों से आंसुओं की अविरल धारा बहने लगी...शरीर किसी अज्ञात कंपन से कांपने लगा...रोआँ रोआँ रोमांचित हो उठा ....वे गुनगुनाने लगे....और गीत का जन्म होने लगा !
    दूसरे दिन उन सज्जन ने गुरुदेव से कहा " माफ़ करिए ...अपराधी हूँ...पर कल मैंने आपको चोरी से देखा था....एक विचित्र बात हुई थी...आप बिलकुल मिट गए थे...तब गीत उतारा था "
    गुरुदेव ने कहा " गीत उतरता ही तब है !"

    और यही सच है...खोजते-खोजते जब खुद खो जाओगे ....तभी मिलन होगा !
    विरह के सघन वन में....एकांत के मरुस्थल में...जब नंगे पैर चलोगे....जब बरसती आँखों में डूबोगे.......आर बकौल ग़ालिब " आग के दरिया में डूब के जाना है " पर खरे उतरोगे ....हाँ ! तब....तब कहीं....तुम प्रेम को पा सकते हो...

    प्रेम का मार्ग....दुष्कर है......जटिल है......दुरूह है !
    पर ये भी सच है कि इसे तय वही कर पायेगा .....जिसकी निष्ठा...आस्था .....संकल्प...अडिग होगा !
    और यही सीधी सच्ची सी बात है !

    अनुपम......अनूठी अभिव्यक्ति !
    और तुम सी ही मन को छू लेने वाली !

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    1. दी ! अभिभूत हूँ ...आपने इतना कुछ कह दिया है मुझ अकिंचन के लिए ........आप कभी मुझमे शायरा ढूंढ लेती हैं ...कभी मेरी काव्य प्रतिभा को मान देती हैं ....यकीन जानिए मुझमे ऐसा कुछ भी नहीं जिसे सराहा जाये ....ये पंक्तियाँ ...या इस तरह की पंक्तियाँ वर्षों पहले मैं स्वान्तः सुखाय लिखती थी .....इस लिखे में भी करीब सोलह वर्षों का अंतराल आ गया ...ये सोलह वर्ष गँवा देने का दुःख है मुझे ....मगर इस दौरान जीवन के दूसरे आयामों को संतुष्ट करने की ख़ुशी भी है.....वर्षों बाद जब लिखना शुरू किया तो आप लोगों ने सराहा ...... आप जानती हैं कि आप से और निधि से मिले प्रोत्साहन ने मुझे ब्लॉग बनाने कि प्रेरणा दी ....साहित्य में मेरी रूचि ज़रूर है मगर साहित्यकारों सा ज्ञान नहीं ...इसी कारण सहज शब्दों में भावनाएं व्यक्त कर देती हूँ ...ये तो आप का स्नेह और मेरे प्रति प्रेम है जो सहज ही व्यक्त होता है ...और इसी स्नेह की परिणति है कि आप मेरे इस छोटे से प्रयास को ..सबसे बांटना चाहती हैं ....बताना चाहती हैं अपनी इस छोटी सी बहन का छोटा सा प्रयास ....फिर कहती हूँ.. आपके स्नेह के आगे शुक्रिया शब्द बहुत छोटा है ..इसलिए आपका स्नेह और आशीर्वाद मागूंगी सदा के लिए ..मालूम ये भी है कि बिन मांगे मिलेगा ये सब .....♥

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  4. मूसलाधार बरसती उन्मत्त आँखों मे कई बार डूबोगे
    प्रेम की प्रचंड उद्दाम बहती नदी मे तैर पाओगे?
    ....हर शब्‍द में गहराई, बहुत ही बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

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