बुधवार, 5 दिसंबर 2012

खाली काग़ज़

सारी रात.......
शब्द बुने...अर्थ गढ़े
दिन के उजाले मे
कुछ मानी तलाशे
और फिर.....
शाम की हथेली पर
बस खाली काग़ज़ रख दिया
....................
क्या वो नज़र
पढ़ पाएगी ये अफ़साना ?



शनिवार, 1 दिसंबर 2012

नींद और जाग के बीच



जब तुम
सियाह रातों में
तकदीर के उजले सफ़हों पर
सुनहरी ख़्वाब लिखना 
तो तुम्हारी जाग बनकर
निहारूंगी तुम्हारे सपनों के खाके
भर दूंगी अपने वो रंग सारे
जो होंगे तुम्हारी आकांक्षाओं से
चटख और गहरे..

जब तुम ख़्वाबों को उड़ान देना
तो जोड़ दूंगी अपने भी पंख,
बौनी सी ताक़त,
और अदम्य हौसला ..
जो दम लेंगे वहीं,
जहाँ बैठ तुम्हारे ख़्वाब सुस्तायेंगे ...

सुबह होने से ठीक पहले
जब तुम
थक जाओ
तो तुम्हारी पलकों में
वापस आऊँगी नींद बनके
और घुल जाऊंगी ज़ुबान पर
मिठास बनके
कि भोर हो जब
तो देख सकूं तुम्हारे साथ
एक उजला मीठा ख़्वाब
आकार लेते हुए .  

 

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