शनिवार, 1 दिसंबर 2012

नींद और जाग के बीच



जब तुम
सियाह रातों में
तकदीर के उजले सफ़हों पर
सुनहरी ख़्वाब लिखना 
तो तुम्हारी जाग बनकर
निहारूंगी तुम्हारे सपनों के खाके
भर दूंगी अपने वो रंग सारे
जो होंगे तुम्हारी आकांक्षाओं से
चटख और गहरे..

जब तुम ख़्वाबों को उड़ान देना
तो जोड़ दूंगी अपने भी पंख,
बौनी सी ताक़त,
और अदम्य हौसला ..
जो दम लेंगे वहीं,
जहाँ बैठ तुम्हारे ख़्वाब सुस्तायेंगे ...

सुबह होने से ठीक पहले
जब तुम
थक जाओ
तो तुम्हारी पलकों में
वापस आऊँगी नींद बनके
और घुल जाऊंगी ज़ुबान पर
मिठास बनके
कि भोर हो जब
तो देख सकूं तुम्हारे साथ
एक उजला मीठा ख़्वाब
आकार लेते हुए .  

 

2 टिप्‍पणियां:

  1. चलो न...फिर देर किस बात की.मुझे चाहिए है वो रंग...वो अदम्य हौंसले वाली ताक़त .....और वो मिठास भी
    सब का सब चाहिए .मिलेगा क्या?
    यूँ भी तूलिका मुझे लगता है कि जब कोई आपके साथ खड़ा हो..हर सुख में हर दुःख में...तो बौनी ताक़त को भी अदम्य हौंसला मिल जाता है .कोई अपना जब थका हुआ हो तो उसे सोते देखना...ख़्वाबों की दुनिया में जाते देखना...फिर उनको साकार होते देखना ...से ज्यादा खुशगवार कुछ नहीं .

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  2. बहुत खूब ! बड़ी सफलता के लिए ऐसे ही साथी चाहिए .सुन्दर!

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