शुक्रवार, 13 अप्रैल 2012

खामोशियों की उम्मीद























आज फिर मेरी खामोशियाँ..
तुम्हें छूकर
खामोश ही लौट आयी हैं.
कितने सवाल कर चुकी हूँ ...
कितने उलाहने दे चुकी हूँ ...
हर तरह टटोल भी लिया है
मगर खामोशियाँ बोली हैं कभी
जो बोलेंगी ,

इक उम्मीद ओढाई थी मैंने उन्हें
तुम देख नहीं पाए शायद
लौट आई हैं वो नाउम्मीद होकर.
इतना तो जानती हूँ कि
खामोश उम्मीदें
गहरी उदासियों के पार नहीं जा सकती
नहीं सहला सकतीं उस दर्द को
जो पल रहा है बरसों से.

मेरी खामोशियों पर
अपनी आवाज़ के
कुछ कतरे ही चिपका देते...
मेरे दर्द को कुछ तो सांस आती..
वरना दम घुटता है
दर्द का भी .

10 टिप्‍पणियां:

  1. खामोश उम्मीदें गहरी उदासियों के पार नहीं जा सकती.....गहरी बात कह दी,तुमने.पर,अपनी उम्मीदों की खामोशी को बोलने के लिए मजबूर कर देना भी..हमारे अपने ही बस में है.वो जो बरसों के पाले पोसे...दर्द हैं ...उन तक पहुँच कर उनको सहलाने के लिए विगत का एक लंबा सफर तय करना पडेगा जो सबके बस की बात कहाँ?
    दर्द को सांस आने की परवाह...क्यूँ कर है?खत्म क्यूँ नहीं हो जाने देती उस दर्द को ...घुट जाने दो न उस दर्द का दम .....क्यूँ उसकी सांसें कायम रखने पे तुली हुई हो....शायद,इसलिए कि कुछ दर्द ऐसे होते हैं जिनके बिन हम अपने वजूद की कल्पना भी नहीं कर पाते हैं.
    बढ़िया है जी....!!किसी की आवाज़ के कतरे आपके दर्द के सिलसिले को कायम रखें...यही दुआ है....

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  2. आज फिर मेरी खामोशियाँ..
    तुम्हें छूकर
    खामोश ही लौट आयी हैं.
    कितने सवाल कर चुकी हूँ ...
    कितने उलाहने दे चुकी हूँ ...
    हर तरह टटोल भी लिया है
    मगर खामोशियाँ बोली हैं कभी
    जो बोलेंगी..... खामोसियाँ ही तो बोल रही है.....

    उत्तर देंहटाएं
  3. मेरी खामोशियों पर
    अपनी आवाज़ के
    कुछ कतरे ही चिपका देते...
    मेरे दर्द को कुछ तो सांस आती..
    वरना दम घुटता है
    दर्द का भी .


    आखरी की यह पंक्तियाँ बहुत अच्छी लगीं मैम

    सादर

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  4. कल 14/04/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  5. खामोश उम्मीदें ,गहरी उदासिओं के पार नहीं जा सकतीं | खामोशियों पर चिपके आवाज़ के कतरे भी ,कोरों पे थोड़ी सीलन के सिवा कुछ नहीं देते | पर ऐसे में भी बयान करने हाल -ऐ-दिल ,बजारिया -ऐ -सुखन ,बड़ी बात है | सुंदर अभिव्यक्ति |

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  6. बहुत सुंदर तूलिका जी.....
    वाकई दर्द का दम घुटता है खामोशी से.....

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  7. अर्चना पंत14 अप्रैल 2012 को 1:49 am

    तूलिका हर बार तुम्हारे अक्षरों में मुझे मेरी पीड़ा ही रिसती हुई क्यों दिखाई देती है ?
    क्यों होता है ऐसा...कि तुम्हारा लिखा हर बार मुझे इतने गहरे कुरेद देता है....कि लगता है जैसे मेरी निरीह, अनावृत व्यथा ; हर एक की दृष्टि से बचने का निरर्थक प्रयास कर रही है ?
    कल ही किसीके status पर लिखा था मैंने....'Indifference Asphyxiates' .......उदासीनता साँस घोंट देती है .....और कैसे तो विकल , दयनीय से हो जाते हैं हम...बिलकुल कातर !....खींचतें हैं सांसें जीजीविषा में....
    इसकी अकथ वेदना....असह्य्य यातना को वोही जानता है....जिसने इसकी मर्मान्तक पीड़ा को जिया भोगा है !
    फिर भी हम ख़ामोश उम्मीदों को जिलाए रखते हैं...हर पराजय , हर निराशा के बावजूद ....क्योंकि ये प्रेम ही तो हमारे बस में नहीं !
    हम तो स्वयं उसके अधीन....डूबते-तिरते हैं उसकी आस में..ईप्सा में !
    वो दर्द फिर अभीष्ट है ....क्योंकि वो ही तो जोड़ता है प्रिय से .....
    वो है तो फिर-फिर पहनाती हूँ उम्मीदों की बांधनी चूनर अपनी खामोशोयों को...फिर-फिर भेजती हूँ उन्हें...प्रिय की देहरी...प्रिय के द्वार...
    कभी तो आयेगा वो दिन.....कि मेरी चूनर की कोने पर वो अपना एक स्वर ही बाँध देगा.....
    वही स्वर ....मेरी संजीवनी होगा !

    तुम्हें बधाई नहीं दूँगी....
    तुम्हारा मेरा तो आंसुओं का रिश्ता है....
    वही दे रही हूँ......स्वीकार करना !

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  8. बहुत गहन और बहुत सुंदर .....
    अंतस तक उतर रही है खामोशी की पीड़ा ....बिलकुल खामोश सी ......

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  9. मेरी खामोशियों पर
    अपनी आवाज़ के
    कुछ कतरे ही चिपका देते...
    मेरे दर्द को कुछ तो सांस आती..
    वरना दम घुटता है
    दर्द का भी .
    .....वाह तुलिका जी ....हमने भी मौन को कई बार ...कई तरहसे टटोला....झकझोरा ....लेकिन आपकी लेखनी तो कमाल कर गयी......बहुत ही सुन्दर !!!

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