शुक्रवार, 20 अप्रैल 2012

वजह जीने की


















   

कुछ वजहें जीने की
आस पास बिखेर रखी हैं
दिखती हैं, सुनाई देतीं हैं
तो लगता है ज़िंदा हूँ मैं .

सजा रखी हैं कुछ शोकेस में
सजावटी सामान की तरह
जैसे बेजान, बेवजह सी
खूबसूरत चीज़ें भी तो
होतीं हैं वजह जीने की .
कुछ रखी हैं बुकशेल्फ़ में
किताबों के पन्नों के बीच दबी
अक्षर अक्षर महकती सी ...
बेजान अक्षरों के मानी भी
होते हैं कभी कभी ..वजह जीने की .

कुछ को ओढती हूँ बिछाती हूँ
पहनती हूँ खाल के नीचे
मांस और लहू से चिपकी हैं वो
उतारने पर दर्द होता है असहनीय ..
इश्क़ एक बार पहन कर
उतारा नहीं जा सकता.
इश्क़ न हुआ,
कोई हरी बूटी हो गयी
मुश्किलों के सिलबट्टे पर पिसी
भरोसे की छन्नी में छनी
घुली हुई भंग की तरह
पीते रहो उम्र भर घूँट घूँट..
जीने का सामान ऐसा भी तो होता है .

6 टिप्‍पणियां:

  1. इश्क का नशा ..जानलेवा.हरी बूटी का नशा तो फिर भी उतर जाता है...पर इश्क वो नशा कि एक बार चढ जाए तो उम्र भर नहीं उतरता .कोई दवा...कोई दुआ...कोई झाड ..कोई फूंक असर नहीं करती.
    रग रग में बहता हो जो..दिल में रहता हो जो....रूह में बसता हो जो....वो कभी उतरता है क्या?
    कुछ वजह ...रखनी पड़ती हैं..बनानी पड़ती हैं..जीने के लिए.
    ज़रूरी थोड़े ही है कि हर कोई इतना खुशकिस्मत हो कि उसे मोहब्बत हो जाए .
    तूलिका...तुम्हारे बिम्ब बिलकुल अलग और बड़े सटीक होते हैं...यहाँ भी बिम्ब बहुत खूबसूरत बन पड़े हैं..बधाई .

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  2. कुछ वजहें जीने की
    आस पास बिखेर रखी हैं
    दिखती हैं, सुनाई देतीं हैं
    तो लगता है ज़िंदा हूँ मैं .आपकी रचना बहुत कुछ सिखा जाती है..

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  3. तूलिका तुम्हारा लिखा सीधे आत्मा में उतरता है.....जानती हो क्यों ? .....
    क्योंकि तुम जब-जब ...जो-जो लिखती हो अपने प्राणों को निचोड़ कर लिखती हो .....
    वही लिखती हो , जो जीती हो......भोगती हो...महसूस करती हो !...कपोल कल्पना का कुछ भी नहीं !....
    और इसलिए तुम्हारे शब्द जीवंत होते हैं .... जागृत ....स्पंदन युक्त....सप्राण !

    सच ही कहती हो तुम....चाहे जितनी वजहें इकट्ठी कर लें हम जीने कीं......
    जीते तो बाख़ुदा हम सिर्फ़ इश्क़ के लिए हैं...." उसी को देख के जीते हैं जिस क़ाफ़िर पे दम निकले..."
    प्रेम जब घटता है ज़िंदगी में .....तो एक सम्पूर्ण क्रान्ति सी हो जाती है ....... फिर कुछ भी तो पहले सा नहीं रहता !....
    न हम.....न हमारी सोच... न ज्ञान.....न तर्क......न बुद्धि ...न देह...न प्राण...न सुधि ...
    फिर प्रेम बजाता है वंशी धुन....
    और मन की राधा उद्भ्रांत सी भागती है...बेसुध प्रेम में....कहाँ गगरी ?...कहाँ चुनरी ? ..कहाँ लोक लाज की चिंता ?
    बस एक ही स्वर गूंजता है सारे ब्रह्माण्ड में....प्रिय की वंशी !....प्रिय का स्वर !

    सच ही कहती हो तुम ! प्रेम बड़ा जिद्दी है......
    विषमताओं में ही खिलता है....
    जितना पीसो उसे कठिनाइयों के सिलबट्टे पर !....
    जितना घोटो उसे कष्टों के खरल में !...... जितना भी सोधना हो सोध लो दुर्दाम , दुष्कर परिस्थितियों में !
    वो तो और से और ही निखरेगा....मेहँदी के पत्तों सा और छोड़ेगा " लाली मेरे लाल की...."
    छनेगा भी स्वयं अपनी ही आस्था में !...
    क्योंकि प्रेम है - तो आस्था स्वतः ही होगी ; प्रेम में ही निष्ठां अन्तर्निहित होती है !
    उम्र भर क्यों पीना है उसे ?
    उसकी तो एक घूँट ही बहुत है ; पूरी ज़िंदगी के लिए......

    तूलिका .... ये कौन सा जादू है री तेरी लेखनी में ?
    जब लिखती है भिगा देती है....अंतस तक !...
    आर्द्र कर देती है ...कितना तो !
    आज मैं फिर भीग गयी ...तेरी प्रीत की फुहार में !

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  4. कल 23/04/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  5. प्रेम को समझना और डिफाइन करना कोई सरल काम नहीं है |पर उसकी छुअन
    अंतर तक भिगो जाती है |प्यारी रचना |बधाई |
    आशा

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  6. बिल्कुल ही नये बिम्ब, कोमल अनुभूतियाँ अंतस में उतरती हुई, वाह !!!

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