गुरुवार, 29 मार्च 2012

मेरी आँखों के ख्वाब





कितने ही ख्वाबों को 
यादों की जिल्द लगा 
पलकों की कोरों पर 
करीने से सहेजा है ...
जैसे  अलमारी में 
किताबें सजाता है कोई .

कितने ही ख्वाबों को 
ताकीद की गिरह से बाँध 
मन के खूंटे से 
बाँध दिया है कस के ...
जैसे पगहे में 
गाय बांधता है कोई .

कुछ  सुर्ख-सियाह ख्वाब
ऐसे भी हैं बेचारे
जिन्हें हरदम बुनती रहती हूँ ..
जैसे ऊन सलाई और फंदों से
डिज़ाइन बुनता है कोई .

कुछ ख्वाबों को डालकर 
अक्सर भूल जाती हूँ 
तकिये के नीचे ..
चादर की तहों में ..
राशन की रसीदों की पीठ पर 
या डायरी के पन्नों में .

कुछ चलते ही रहते हैं 
फिल्म की तरह आँखों में
बिना इंटरवल ब्रेक के ...
कुछ डेली सोप की शक्ल 
अख्तियार कर लेते हैं ...
रोज आते हैं, बिला नागा 
तयशुदा वक्त पर दस्तक देने .

मेरी आँखों में 
ख्वाबों का recurring deposit है 
ऊपर वाला इन खातों पर 
maturity date डालना 
भूल गया है .



रविवार, 18 मार्च 2012

ऊसर धरती



देखी है कभी ...
वर्षों से सूखे का दंश झेलती 
पपडियाई...दरारों से भरी 
बंजर धरती पर 
वर्षा की बूँदें ...

सुनी है कभी
वो सनसनाहट की आवाज़...
भीतर  से निकलते ताप 
और जलवाष्प को 
छुआ है कभी ...

ऊसर न हो 
उर्वर बनी रहे 
ताप न्यून हो जाए 
पपड़ियाँ खत्म हों 
दरारें भर जाएँ
भीज जाए वो भीतर तक...
इसके लिए दरकार 
मूसलाधार की नहीं 
रिमझिम.. अनवरत..
बरसते  मेह की है.

ऐसे  ही 
तुम भी बरसो न 
नेह बन के.


शनिवार, 17 मार्च 2012

सच कहना ज़रूरी नहीं






 सहस्त्राब्दियों से
पुरुष होने के दर्प से तने हो
क्यों नहीं झाँक पाए कभी
झुक कर स्त्री मन ?

स्वयं को गढ़ने और बढ़ने हेतु
जब व्यवस्थाएं बनाई तुमने
क्यों छोड़ दिया स्त्री को
अस्पृश्य और अयोग्य की तरह ?

हर हाल में प्रतिस्पर्धा
जीतने की तुम्हारी उत्कंठा में
हर बार तुम्हारे भाल पर
स्त्री ने ही तिलक लगाया न ?

ये तुम्हारा पौरुष ही था
कि अपने मार्ग की बाधाएं
तुमने उपहार में दे दीं स्त्री को
कि इतरा सको अपनी जीत पर.

भिक्षा की तरह उसके अपने ही
अधिकार सौंपते, एक बार फिर
जीत ही गए तुम
सच कहना, स्त्री विमर्श की आड़ में
धीरे धीरे खुलते स्त्री के बंधनों से
तुम तिलमिला जाते हो न ?

उसकी उपलब्धियों पर तुम्हारी आँखें
रसोई से उठी धुआँस
और कड़वे धुंए से भर जाती हैं
सच कहना, क्या उसी रसोई में बनी रोटी में
तुमने कभी कड़वाहट महसूस की ?

उसकी कविताओं गीतों में तुम्हे
पोतड़ों से सने उसके घिनहे हाथ दिखे
सच कहना, इसी वजह से
क्या उसे भोगते हुए तुम्हे कभी घिन आई ?

उसे भोग तुम आनंदित होते रहे
उसने अपने छोटे से आनंद का भी
उपभोग नहीं किया, उसका क्या ?

तुम्हारी एक बात भी अनसुनी करे
तो तुम्हारी अवहेलना की भागी बने
और उसने जो अपने मन की
वर्षों अवहेलना की, उसका क्या ?

शुक्रवार, 16 मार्च 2012

परहेज़

 








सोचा है ....
तुमसे नहीं मिलूँगी
स्मृतियों मे भी नही
स्वप्नो मे भी नही

समस्त चेतनाओं को
आदेश दूँगी....
कि पथिक आए
तो रोके रखना

अवचेतन मन के किवाड़ भी
बंद कर दूँगी ....
आत्मनियंत्रण की
सीमाएँ भी बढ़ा दूँगी

मगर क्या इतने परहेज़
काफ़ी होंगे ?
ये पाश क्या कभी
बाँध पाएँगे .....मेरे प्रेम को
जिसमे बँधी हूँ .....
....................मैं ||

सोमवार, 12 मार्च 2012

मुक्ति मार्ग




























मेरा मन मेरा सदगुरु हो जाये
वो माध्यम बन जाये तुम तक पहुँचने का
क्योंकि वो सान्निध्य में है तुम्हारे
उसको अनुभूति है तुम्हारी

मेरी आँखें वो झरोखा हो जाएँ
जो दिखा सकें एक झलक तुम्हारी
वो पहचानती हैं तुम्हें
क्योंकि वहाँ तुम्हारी आकृति अंकित है

मेरी श्रवणेद्रियाँ वो द्वार हो जाएँ
जिनसे तुम अंदर आ सको
अपने पवित्र श्लोक वाचन के साथ
क्योंकि वो परिचित हैं तुम्हारे स्वर से

मेरे पावों में वो खोजी प्रवृत्ति हो
जो ढूंढ सकें तुम्हें हजारो मील यात्रा कर के भी
लयबद्ध हो सके तुम्हारी पदचाप से
क्योकि वो तुम्हारे क़दमों के अनुगामी हैं

मेरी त्वचा इतनी संवेदनशील हो जाए
कि वो तरंगित हो सके
तुम्हारे आस पास होने से ही
क्योंकि उसने स्पर्श किया है तुम्हारे तेजोमय रूप को.

मेरी आत्मा इतनी पावन और सूक्ष्म हो जाए
कि जब चाहे तुमसे लौ लगाकर आलोकित हो सके
कुछ ऊर्जा तुमसे ले स्वयं में प्रवाहित कर सके
और घनीभूत हो तुममे ...परमात्मा में समाहित हो सके .

शनिवार, 3 मार्च 2012

दो बोल ..प्यार के




मेरे मीत ...
कस कर थाम लो हाथ
खींच लो एक बार फिर
बोझ से दब गयी हूँ ..
उतार  दो
ये पीर का पर्वत
सांस नहीं ले पा रही
घुट रही हूँ मैं ...
लड़ते लड़ते
पाँव थक गए हैं.
जिंदगी की जंग में
हार  न जाऊं, इसलिए
एक बार तो दे दो सहारा
अपने मज़बूत कांधों का.

या फिर ....
संचरित कर दो
अपनी प्रीत का प्रवाह
तो जी उठूँ मैं
तत्पर हो सकूं लड़ने को
आगे बढ़ने को.
और अगर .....
ये सब नहीं कर सकते
तो सिर्फ दो बोल
प्यार के ही बोल दो
कुछ दिन और जी लूंगी .

कुछ चित्र ये भी