सोमवार, 12 मार्च 2012

मुक्ति मार्ग




























मेरा मन मेरा सदगुरु हो जाये
वो माध्यम बन जाये तुम तक पहुँचने का
क्योंकि वो सान्निध्य में है तुम्हारे
उसको अनुभूति है तुम्हारी

मेरी आँखें वो झरोखा हो जाएँ
जो दिखा सकें एक झलक तुम्हारी
वो पहचानती हैं तुम्हें
क्योंकि वहाँ तुम्हारी आकृति अंकित है

मेरी श्रवणेद्रियाँ वो द्वार हो जाएँ
जिनसे तुम अंदर आ सको
अपने पवित्र श्लोक वाचन के साथ
क्योंकि वो परिचित हैं तुम्हारे स्वर से

मेरे पावों में वो खोजी प्रवृत्ति हो
जो ढूंढ सकें तुम्हें हजारो मील यात्रा कर के भी
लयबद्ध हो सके तुम्हारी पदचाप से
क्योकि वो तुम्हारे क़दमों के अनुगामी हैं

मेरी त्वचा इतनी संवेदनशील हो जाए
कि वो तरंगित हो सके
तुम्हारे आस पास होने से ही
क्योंकि उसने स्पर्श किया है तुम्हारे तेजोमय रूप को.

मेरी आत्मा इतनी पावन और सूक्ष्म हो जाए
कि जब चाहे तुमसे लौ लगाकर आलोकित हो सके
कुछ ऊर्जा तुमसे ले स्वयं में प्रवाहित कर सके
और घनीभूत हो तुममे ...परमात्मा में समाहित हो सके .

4 टिप्‍पणियां:

  1. मन से आत्मा तक तरंगित हो गयी तुलिका तुम्हारी कविता की सभी पंक्तियाँ .....प्रेम व भक्ति की पराकाष्ठा शायद यही है ....!!!साधुवाद इस कविता के लिए ..पूरे अंतरतम को भिगोती हुयी रचना है !!

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    1. सरोज दी ! अच्छा लगा ये जान कर कि आपको कविता अच्छी लगी ....अपने लिए कहूंगी कि कवि मैं नहीं हूँ, हाँ! कवि ह्रदय ज़रूर हूँ ...इसलिए यदि मेरे ह्रदय से निकली भावना ने यदि आपके अंतरतम को छुआ है तो इसका मतलब मैं अभिव्यक्ति में कुछ सफल हुई ..सराहना के लिए आभार

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  2. इस आत्म का यानि अपने अहम् का त्याग ...और उस परमात्म से सम्मिलन ...बस यही कामना ....द्वैत से अद्वैत की ओर. ...............इस मुक्ति मार्ग में कुछ अपना रहा ही कहाँ...सब मेरा भी तो तेरा ही है न ..
    बस....तुलिका,इस के लिए मात्र इतना कहूँगी कि तुम्हारे मन शीघ्रातिशीघ्र ....सद्गुरु हो जाए...और ले चले तुम्हें ...इस महामिलन की ओर.............!!
    तुम्हारी छाप...इस कविता में भी दिखती है..वो अगाध प्रेम वो अमिट श्रद्धा ....हर शब्द से टपक रही है.

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    1. आत्म से परमात्म की ओर ..द्वैत से अद्वैत की ओर ..मुक्ति की इसी अवस्था को चाहे अनचाहे हम तलाशते रहते हैं ...इस मार्ग में सफल तभी होंगे जब अपना कुछ शेष न रहे ...यही मैं भी चाहती हूँ ....जिस दिन रचना में से मेरी छाप निकल जायेगी...सबको अपना सा कुछ दिखने लगेगा ..उस दिन वो सही मायनो में कविता हो जायेगी ...

      :) मालूम है मुझे कि मेरी कविता में तुम्हे अपना सा कुछ ज़रूर दिखता है बस वहीँ मेरी कविता सफल है ...है न :)

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