शनिवार, 3 मार्च 2012

दो बोल ..प्यार के




मेरे मीत ...
कस कर थाम लो हाथ
खींच लो एक बार फिर
बोझ से दब गयी हूँ ..
उतार  दो
ये पीर का पर्वत
सांस नहीं ले पा रही
घुट रही हूँ मैं ...
लड़ते लड़ते
पाँव थक गए हैं.
जिंदगी की जंग में
हार  न जाऊं, इसलिए
एक बार तो दे दो सहारा
अपने मज़बूत कांधों का.

या फिर ....
संचरित कर दो
अपनी प्रीत का प्रवाह
तो जी उठूँ मैं
तत्पर हो सकूं लड़ने को
आगे बढ़ने को.
और अगर .....
ये सब नहीं कर सकते
तो सिर्फ दो बोल
प्यार के ही बोल दो
कुछ दिन और जी लूंगी .

6 टिप्‍पणियां:

  1. तुम कितनी संतोषी हो ..यार.!!दो बोल ..काफी हैं तुम्हारे लिए .चलो,कोई तो है जो कम में भी संतोष कर लेता है..आजकल तो सबके साथ यही दिक्कत है कि या तो सब चाहिए या कुछ भी नहीं.
    तूलिका.....वाकई कभी-कभी जब आप अकेले हों..टूट रहे हों...बिखर रहे हों तो ज़रा सा सहारा भी सब बदल देता है...उस जिजीविषा को जाग्रत कर देता है जो कहीं हाईबेर्नेशन में चली गयी होती है .
    वैसे तुम कहो तो मैं कुछ कहूँ................अरे वो दो बोल नहीं...मेरी जान.बस,यह कि ......अच्छा लिख रही हो,बहुत....दूसरी तरह कहो तो मुझे अच्छा लगता है तुम्हारा लिखा,पढ़ना .

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    1. ये बात बिलकुल नहीं है निधि ..प्यार तो उस नशे की तरह है जिसमे डुबोए रखने की ताकत होती है ...कोई आजन्म डूबे रह सकता है ...मगर ये एकतरफा ,अपने हिस्से का प्रेम हुआ न . ये दो बोल तो उसके हिस्से से चाहिए जो डूबे रहने के लिए संजीवनी हो जाएँ ...लड़ने के लिए शक्ति हो जाएँ ...बीमार के लिए दवा हो जाएँ

      जिजीविषा हाईबर्नेशन की किसी भी गहराई में क्यों न चली जाये ..प्रेम की इंसानी फितरत उसे खीच कर बाहर निकाल ही लेती है

      और अंत में ...लिख ही रही हूँ मेरी जान,ये मेरा लिखना खुद से लड़ना, जिजीविषा को हाईबर्नेशन से निकालना ही तो है

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  2. बहुत खुबसूरत प्यार का गीत.....

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  3. आपकी लेखनी से प्यार हो गया लगता है हमें....
    बहुत खूब...
    अनु

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