सोमवार, 27 फ़रवरी 2012

संदूकची भर यादें

कुछ आधी अधूरी बातें 
याद के बटुए की 
चोर जेब में छिपा लीं ..
छोटे छोटे रुक्के 
जो यहाँ वहाँ पड़े थे 
आँचल की गिरह से बाँध लिए ..
हथेली पर बार बार 
एक ही नाम लिखा
और मिटाया ...
नाखून से कुरेद डाले 
वो सारे ज़ख्म भी 
जो भर चले थे ...
पलकों को झपकाया भी नहीं 
बरसों से रुका हुआ 
एक आंसू गिर जाता न ...


कानों  में झूलती रहतीं हैं 
तुम्हारी आवाज़ की बालियाँ 
हाथ बार बार कानों पर जाते हैं 
तेरी आवाज़ को छूने ...


उस छोटी संदूकची में 
सुर्ख रेशमी कपडे से 
बाँध रखे हैं कुछ लम्हे ...

यकीन रखना, उन्हें खोलूंगी नहीं 
उड़ कर अगर तुम्हारे पास पहुंचे 
तो तकलीफ होगी बहुत ...
ये  भी यकीन रखना 
कि ये मेरे दुःख का नहीं 
खुशी का सामान है 
जो सहेजा है .....बड़े जतन से .









8 टिप्‍पणियां:

  1. कानों में झूलती रहतीं हैं
    तुम्हारी आवाज़ की बालियाँ
    हाथ बार बार कानों पर जाते हैं
    तेरी आवाज़ को छूने ...
    कुछ लोगों की आवाज़ जेहन में इतनी गहरी उतर जाती है कि वो जीवन पर्यंत कानून के आस पास ही महसूस होती है.....बहुत सुन्दर!!तूलिका.
    ज़ख्म..ना भी कुरेदो तो मुझे तो लगता है आंसुओं की नमी से उनपे जमा खुरंट गीला हो हट जाता है..और उन ज़ख्मों में आंसुओं का नमक ...एक नया ही कहर ढाता है .

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    1. *क़ानून को कानों पढ़ें

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    2. कमेन्ट का तुम्हारा वाला हिस्सा भी एक कविता ही है ... :)
      सच है ज़ख्म पर नमक हम ही डाल लेते हैं ..आंसू बहा कर ..मगर निधि , ये भी तो सच ही है न कि ये आंसू और ये ज़ख्म हमें अज़ीज़ भी हैं

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  2. तूलिका.....

    तुम्हारी हर अभिव्यक्ति में वो तड़प है....जो सिर्फ़ अनुभव की जा सकती है....
    या फिर कोई तुम जैसा ही कोई विरल मन उसे अपने कपूर से शब्दों में बाँध सकता है !
    वो कपूर जो थोड़ी सी उष्मा से भी उड़ जाए......वो कपूर जो होम हो जाता है स्वतः ही .....हवन में...आह्वाहन में ...आराध्य की !

    यादों के सारे बिम्ब तुम्हारे ....इतने अद्भुत ....इतने मौलिक ...की क्या कहूँ ?
    याद का बटुआ .....
    और वो छोटे छोटे रुक्के जो अपनी आँचल की गिरह में बाँध लिए हैं तुमने ........
    नाखूनों से कुरेदें हैं जो भर आये से ज़ख्म हथेलियों के ..........
    वो आँसू जो बरसों से रुका हुआ है आँखों में.....और जिसे ढुलकने भी नहीं देना है...........कानों में झूलतीं सीं प्रिय की आवाज़ की बालियाँ ......और वो छोटी सी संदूकची...जिसमें सुर्ख रेशमी कपडे से बाँध रखे हैं........कुछ लम्हे !

    हर बिम्ब इतना सटीक....इतना जीवंत...... कि बस विस्मित करता है !
    और उससे कहीं अधिक विस्मित करती है...तुम्हारी प्रेम की प्रतीति....तुम्हारे प्रेम की आस्था .....तुम्हारे प्रेम का सौन्दर्य !

    इतना सब होने पर भी ....मन में द्वेष नहीं...कटुता नहीं.........
    है तो मात्र ये आग्रह कि जो हो सो हो ...... बस मेरे प्रिय को पीड़ा न पहुंचे !
    कितना माधुर्य है इस प्रेम में.....कितनी निष्ठा !
    प्रेम ......हाँ प्रेम ऐसा ही होता है !

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    1. दी जब कोई अपना ..बेहद अपना होता है न तो उसकी सारी चीज़ें अच्छी लगती हैं ..उसका दिया प्रेम भी ....उसकी उद्दंडता भी ..उसकी मान मनुहार ..उसकी सही गलत बातें ...उसकी खुद को कहने की हर कोशिश ...ऐसा ही है आपका मेरे प्रति प्यार ..कुछ भी लिखती हूँ तो आप हमेशा ऐसे ही उत्साहवर्धन करती हैं ....मुझे गढती भी हैं ..अंतर हाथ सहार दे बहार बाहे चोट तो सबने सुना होगा ....मगर अंदर और बाहर दोनों से सहारा दे कर गढना मैंने महसूस किया है ...........मेरे बिम्ब मेरे निरंतर देखे गए स्वप्न हैं ..और सपने सबको अच्छे लगते हैं .....आप कहती हैं न कि मेरे मन में कटुता और द्वेष नहीं हैं ..होंगे कैसे ?..जहाँ प्रेम होता है वहाँ ये पाए नहीं जाते ..और चूकि पीड़ा मुझे बहुत सालती है सो मैं किसी को पीड़ा पहुंचा भी नहीं सकती ......सच ऐसा ही है मेरा प्रेम ..सही पहचानती हैं आप मुझे .

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  3. कानों में झूलती रहतीं हैं
    तुम्हारी आवाज़ की बालियाँ
    हाथ बार बार कानों पर जाते हैं
    तेरी आवाज़ को छूने ... khoob bahut khoob

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    1. आवाज़ को छुआ है कभी ..महसूस किया है ? मैंने किया है

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  4. सुन्दरतम अनुभूति है एहसासो को छूने का जतन और अनुभव .... महसूसने की पराकाष्ठा प्रतिबम्बित हो रही है पंक्तियो ं मे

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