शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2012

रोज़ ...हर रोज़



रोज़ ...हर रोज़
मुँह अँधेरे से ही
शुरू हो जाती है एक जंग
उन चुनौतियों से
जो परिस्थिति ने मुझे
तोहफे में दी हैं .

रोज़ ..हर रोज़
मुँह अँधेरे से ही
जुट जाती हूँ मय असबाब
जंग जिंदगी से जो है
जिंदगी भी खूब खेल खेलती है
आज़माती है सारे जंगी दांव पेंच

रोज़ ..हर रोज़
मुँह अँधेरे से ही
बचती हूँ संभलती हूँ
उन दोधारी तलवारों से
जिन पर रोज़ ..हर रोज़
नंगे पाँव चलती हूँ
दिन भर.. मुँह अँधेरे से ही

रोज़.. हर रोज़
मुँह अँधेरे से ही
पकड़ लेती हूँ उस उम्मीद का दामन
जो ये कहती है कि
आज तुम ज़रूर जीतोगी
लेकिन दिन भर लड़कर
शाम को थक जाती हैं
सारी उम्मीदें 
लेकिन न जाने क्यूँ
रोज़ ..हर रोज़
मुँह अँधेरे से ही
वही उम्मीदें जाग जाती हैं
अंगड़ाई लेकर उठ जाती हैं
फिर लड़ने को जिंदगी की जंग .

 

4 टिप्‍पणियां:

  1. बस...यही उम्मीद ज़िंदा रखना...ज़रूरी है.बाक़ी सब तो अपने आप ..ठीक हो जाता है.दिन भर की जंग का बेहतरीन चित्रण!!हरेक व्यक्ति इस संसार में आकार एक तरह की जंग लड़ रहा है..जीतते वही हैं जो लगातार कोशिश करते हैं और हार नहीं मानते .

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    1. चाहे जितना आजमा ले हमें ये जिंदगी
      हम अपने हौसलों की हद भी बढ़ा लेंगे

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  2. लेकिन न जाने क्यूँ
    रोज़ ..हर रोज़
    मुँह अँधेरे से ही
    वही उम्मीदें जाग जाती हैं
    अंगड़ाई लेकर उठ जाती हैं
    फिर लड़ने को जिंदगी की जंग .......

    यह जो रोज़-रोज़ की अनिश्चितता है न तूलिका....मुझे बहुत आशान्वित करती है.....कि हो सकता है इसी रोज़-रोज़ में कुछ वो आये जिसे हमारे लिए आना है......

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  3. हाँ विमलेन्दु ...हर रोज़ नयी जंग लड़ने पर हर रोज़ जीतने की उम्मीद कायम तो रहती ही है

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