बुधवार, 15 फ़रवरी 2012

बाँध मौन का





इसलिए मौन हूँ कि ..
दर्द की मेरी अनुभूतियाँ
तुम्हें भी व्यथित करेंगी
मेरे दुखों की चिंदियों से
तुम भी तार-तार हो जाओगे ...
पीड़ा की जिन ईंटों में
चिन दी गयी हूँ मैं
उनके भीतर तुम भी
सांस नहीं ले पाओगे ...
विराग में भी अनुराग का
जो सियाह दुशाला मैंने ओढ़ा है
कांधों पे उसका बोझ
उठा नहीं पाओगे ....

नहीं कहना चाहती अपनी व्यथा
अपनी पीड़ा का इतिहास
अपने वियोग की कथा
और उपेक्षा की गाथा ...

....संभव है सुनकर

पत्थर तुम्हारे भीतर
और सख्त हो जाये
ये भी संभव है ....
मेरे स्वर का स्पर्श
स्वयं मुझे छूकर
बिखेर दे टुकड़ों में .

20 टिप्‍पणियां:

  1. संभव है...

    और ऐसे ही कभी एब्सट्रेक्ट वाक्यों से जब कोई मूर्त सा खयाल जगे तो किया जाये?

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    1. KC ऐसे ही कभी एब्सट्रेक्ट वाक्यों से... या बेवजह की बातों से जब कोई मूर्त सा खयाल जगे तो...अच्छे दोस्तों से साझा कर लेना चाहिए

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  2. "... ये भी संभव है ....
    मेरे स्वर का स्पर्श
    स्वयं मुझे छूकर
    बिखेर दे टुकड़ों में..."

    इसलिए शायद मौन ही बेहतर है...

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    1. मुखर के जो दो प्रभाव हो सकते हैं उन्हें सोचकर तो ऐसा ही लगता है कि मौन ही बेहतर है

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  3. विराग में भी अनुराग का
    जो सियाह दुशाला मैंने ओढ़ा है
    कांधों पे उसका बोझ
    उठा नहीं पाओगे ....ये पंक्तियाँ अंतस तक को उद्वेलित कर गयी .
    इस कविता में जो ना कह पाने की पीड़ा है ..वो बाक़ी सारे दुखों पे भारी है.उपरी चाह है कि कोई आगे बढ़ के ना पूछे मेरे दुःख ..ना सहलाये मेरे ज़ख्म पर कहीं अंदर किसी अपने को अपने बारे में कह कर ...जो खुद हल्का हुआ जा सकता है...उससे भी बचना है...सहना है...क्यूंकि नहीं चाहते कि हमारे दुखों से वो व्यक्ति भी परेशां हो .
    बांटना चाह कर भी ना बांटना ..दूसरे की परवाह करके ""सुन्दरतम भाव"" है .

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    1. दास्ताँ सुनाने वाला ...उस दास्तान को जीता है ...माजी के दर्द खोल के दिखाना आसान नहीं होता ......खोलने वाले को भी दर्द होता है और देखने वाले का कलेजा भी दहल जाता है ......दर्द के इसी उद्वेलन को बांधती है ये कविता "बाँध मौन का "...निधि इसे इतनी खूबसूरती से समझने के लिए शुक्रिया

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    2. तूलिका...जब कोई अपना अतीत किसी से साझा करता है तो बस यही अपेक्षा होती है कि उसका बांटा ...दूसरा समझेगा ..सहेजेगा .दूसरे व्यक्ति को तकलीफ अवश्य होती है पर साझा करने का विश्वास जो उसपे किया गया और बाँट कर जो हल्कापन बांटने वाले को महसूस हुआ होगा उसके आगे वो तकलीफ सह लेना कोई बड़ी चीज़ नहीं है.

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  4. @तूलिका ............

    मेरी दृष्टि में कविता वही श्रेष्ठ है जो व्यष्टि से समष्टि तक की यात्रा करे !
    कविता तुम्हारी तूलिका से उतरी होगी ...अब मेरी भी है...

    मेरी पीड़ा के गाँव से होकर जाती है.......
    मेरे आँसुओं की गंगा में तिरती है .....
    मेरी वेदना की धरती पर अपने भीगे पैरों की छाप छोड़ती है !

    हाँ ! ये कविता वो सब गाती है..... जो मेरी अपनी अवश मूकता नहीं कह पायी !...
    क्योंकि ये बाँध अगर टूट जाता है .......
    तो मेरी संजोई हुई सारी तटस्थता ......मेरी समग्र सहजता....मेरा सम्पूर्ण संयम.....मानसिक संतुलन सब ही ढह जाएगा.....बिखर जाएगा !

    ये मौन संबल है मेरा........मुझे थामता है....... सहेजता है.....

    तुम्हारी अंतिम चार पंक्तियाँ ...........अद्भुत रूप से समेट लेती हैं ....सारी वेदना को.....

    "ये भी संभव है ....
    मेरे स्वर का स्पर्श
    स्वयं मुझे छूकर
    बिखेर दे टुकड़ों में ."

    मन की दुरूह संवेदनाओं की अप्रतिम अभिव्यक्ति .....
    कमाल का लिख रही हो !

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    1. दी! अगर मेरी कविता व्यष्टि से समष्टि तक की यात्रा की शुरुआत भी करती है तो धन्य हूँ मैं ....मैंने स्त्री के मौन की बात कहनी चाही थी ....किस तरह उसके मौन का बांध कितने आवेगों को बाँध कर रखता है ....उसके मौन के टूटने पर क्या क्या टूट सकता है ...आपने इसकी गहराई को महसूस किया ...मेरा लिखना सार्थक हुआ ....आप लोगों का प्रोत्साहन लिखते रहने को प्रेरित करता रहता है ..

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    1. गोपाल जी सराहना का शुक्रिया

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  6. ये भी संभव है ....
    मेरे स्वर का स्पर्श
    स्वयं मुझे छूकर
    बिखेर दे टुकड़ों में .
    ....बहुत सुंदर अभिव्यक्ति .....

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    1. शुक्रिया रश्मि ...ख़ुशी इस बात की भी है कि तुम्हारी एक कविता ने भी इसी ज़मीन से जन्म लिया

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  7. दोनों स्थितियों में से कोई भी एक संभव है, या दोनों में से एक भी न हो.

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    1. हाँ बाबा! दोनों स्थितियों में से कोई भी एक संभव है,निर्भर करता है दुःख को महसूस करने की उसकी ताकत पर ...दोनों स्थितियाँ एक साथ हों ये भी संभव है , निर्भर करता है परस्पर प्रेम की गहराई पर ..... या दोनों में से एक भी न हो,ये भी निर्भर करता है परस्पर संबंधों की पारदर्शिता पर .....

      धन्यवाद् बाबा ...आपकी टिपण्णी ने इस विषय पर और अधिक सोचने को मजबूर किया मुझे

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  8. शिकवा भी, पीड़ा न देने का भाव भी और पीड़ित होने का डर भी| एक अच्छी कविता|
    कृपया मेरे ब्लॉग पर भी पधारें : http://poetrystream.blogspot.com

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  9. संभव यह भी है कि मेरे भीतर के पत्थर से छूकर तुम्हारे भीतर का दर्द थोड़ा नरम पड़े, सियाह दुशाला एक उजली चादर में तब्दील हो जाये......संभव तो यह भी है कि तुम्हारी उपेक्षा की गाथा अनुराग का आख्यान बन जाये.............हो सकता है पीड़ा के इतिहास से ही फूटे कोई कोंपल और जिसकी हरी छाँव में थोड़ी ज़गह मेरे लिए भी हो....

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  10. ये तो तभी संभव है न विमलेन्दु , जब पत्थर में हरकत हो .....

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