शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2012

रेड वाइन



तुम्हारी
रेड वाइन का एक घूँट
पीकर देखना चाहती हूँ
जानना चाहती हूँ
क्या उसका नशा
वैसा ही सुर्ख होता है
जैसा मेरा प्यार ?

भीतर जाने पर
क्या वो सुर्ख तरल
सियाह उदासी के
गाढ़े द्रव को हटा देता है?
जिसको रोज़
आकंठ पिया है मैंने .

यदि जवाब "हाँ" हो
तो डूब जाना चाहती हूँ
इस लाल समंदर में ......

6 टिप्‍पणियां:

  1. तुम्हारे प्रेम सा ही कुछ खुमार है इसमे भी ..... डूब कर इसमे लेकिन तुम और याद आते हो..... बेहतरीन ....

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    1. रश्मि हार्दिक आभार ...अगर याद आने कि शर्त डूबना है तो सच डूब कर मर जाना बेहतर होगा

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  2. पीता नही शराब,की सच कह रहा हूँ में,
    पर चीज़ लाजवाब है,सच कह रहा हूँ में.

    सूरत शकल न देखिए, चेहरे पे आब है,
    सीने मे उसके आग है,सच कह रहा हूँ में.

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  3. बहुत बढ़िया लिखा है...रोज आकंठ उदासी को पीना...बर्दाश्त करना और ऊपर से मुस्कुराते भी रहना ...यह पीड़ा जो इस पूरी कविता में दिख रही है ....कविता को प्राण दे रही है..प्यार के लाल रंग और रेड वाइन के रंग का साम्य ,अच्छा है.
    मेरी कविता वहाँ से शुरू होती है जहां तुम्हारी खतम होती है .....
    आज मुझे रेड वाइन नहीं पीनी
    इसकी खट्टास ..
    इसका कमज़ोर नशा
    मुझे वो महसूस नहीं करने देगा
    जो मैं महसूस करना चाहती हूँ..

    वो तल्खी...वो कड़वापन
    जो मेरे अंदर भर गया है ..
    ये हटा नहीं पायेगा .
    मैं चाहती हूँ...
    कि...
    रम या व्हिस्की के कई पेग
    अंदर उतार लूं ..नीट .
    और उसकी कड़वाहट
    सब काट के रख दे...
    मैं फिर से मैं हूँ जाऊं....
    सारी कड़वाहट घुल जाए
    और नशा ऐसा हो...
    जो उतरने का नाम न ले
    बिलकुल तुम्हारे प्यार सा...
    उसमें डूब के मुझे
    और कुछ न याद रहे
    हमारे प्यार के अलावा
    तुम्हारे नाम के सिवा

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    1. रोज आकंठ उदासी को पीना...बर्दाश्त करना और ऊपर से मुस्कुराते भी रहना ...यही जीवन की कला है न निधि ...ऐसा अभिनय जिसे सब लोग हर रोज करते हैं ...जो पीड़ा मैं कविता में दिखाना चाहती थी वो परिलक्षित हुई ...और तुम्हे रेड वाईन का इश्क के सुर्ख रंग के साथ साम्य अच्छा लगा ...इसका आभार ...सबसे ऊपर ...इसके आगे की तुम्हारी कविता लाजवाब है ....कड़वाहट को कड़वाहट से काटने का हुनर खुदा तुम्हे अता करे ...दुआ है

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