सोमवार, 27 फ़रवरी 2012

संदूकची भर यादें

कुछ आधी अधूरी बातें 
याद के बटुए की 
चोर जेब में छिपा लीं ..
छोटे छोटे रुक्के 
जो यहाँ वहाँ पड़े थे 
आँचल की गिरह से बाँध लिए ..
हथेली पर बार बार 
एक ही नाम लिखा
और मिटाया ...
नाखून से कुरेद डाले 
वो सारे ज़ख्म भी 
जो भर चले थे ...
पलकों को झपकाया भी नहीं 
बरसों से रुका हुआ 
एक आंसू गिर जाता न ...


कानों  में झूलती रहतीं हैं 
तुम्हारी आवाज़ की बालियाँ 
हाथ बार बार कानों पर जाते हैं 
तेरी आवाज़ को छूने ...


उस छोटी संदूकची में 
सुर्ख रेशमी कपडे से 
बाँध रखे हैं कुछ लम्हे ...

यकीन रखना, उन्हें खोलूंगी नहीं 
उड़ कर अगर तुम्हारे पास पहुंचे 
तो तकलीफ होगी बहुत ...
ये  भी यकीन रखना 
कि ये मेरे दुःख का नहीं 
खुशी का सामान है 
जो सहेजा है .....बड़े जतन से .









रविवार, 26 फ़रवरी 2012

मौन का महाकाव्य




मैं स्त्री
एक किताब सी
जिसके सारे पन्ने कोरे हैं
कोरे इसलिए
क्योंकि पढ़े नहीं गए
वो नज़र नहीं मिली
जो ह्रदय से पढ़ सके

बहुत से शब्द रखे हैं उसमे
अनुच्चरित.
भावों से उफनती सी
लेकिन अबूझ .
बातों से लबरेज़
मगर अनसुनी.
किसी महाकाव्य सी फैली
पर सर्ग बद्ध
धर्मग्रन्थ सी पावन
किन्तु अनछुई .

तुम नहीं पढ़ सकते उसे
बांच नहीं सकते उसके पन्ने
क्योंकि तुम वही पढ़ सकते हो
जितना तुम जानते हो .
और तुम नहीं जानते
कि कैसे पढ़ा जाता है
सरलता से,दुरूहता को
कि कैसे किया जाता है
अलौकिक का अनुभव
इस लोक में भी ....

बुधवार, 22 फ़रवरी 2012

अनागत




मन के दरवाज़े पर
आम्रपल्लवों का
बंदनवार लगाया है
सूनापन भरने को
दीवारों पर सजा दीं हैं
शोख रंग की पेंटिंग्स .
हर कोने अंतरे से
वक्त की धूल भी झाड़ दी है
सुख का जो थोडा बहुत
उजला रंग है, उसी से
पोत दीं हैं सब दीवारें
आस का दीप जला
आले पर धर दिया है
कोने की तिपाई पर रखे
गुलदान में भर दिए हैं
सुधियों से महकते
रजनीगन्धा के गुच्छे ......

अधरों पर ओढ़ी है
प्रेम की स्मित
आँखों में इंतज़ार का
अंजन भी आँका है
तुम अंगुलियां फेर सको
इसलिए बालों को छोड़ दिया है
यूँ ही खुला.. निर्बन्ध
सुनहरे बीते लम्हों के मनके
चुनकर बनाया है मुक्ताहार
स्मृतियों के रूपहले रंग से
चमका ली है आरसी
जिसमे खुद को निहारते ही
तुम पढ़ सको
अपने चेहरे पर लिखी
प्रेम की वो इबारत
जिसे झुठलाते आये हो तुम
उपेक्षा का एक गहरा सा
जो दाग था दिल पर
आज उसी को कुमकुम बना
सजा लिया है अपना माथा
और ये जो सुर्ख ओढनी
ओढ़ ली है न मैंने
उसमें छींट बनकर उभर आये हैं
तुम्हारी बातों के फूल .....



इस तरह सज धज कर
तैयार है तन और मन
निहार रही हूँ दरवाज़े को
पर नहीं जोह रही तुम्हारी बाट
क्योंकि पता है ...
तुम नहीं आओगे
इस तरफ कभी .

मंगलवार, 21 फ़रवरी 2012

प्रार्थना में हूँ





अभीष्ट हो....ईष्ट हो
प्रेम के पुष्प समर्पित हैं तुम्हें
स्मृतियाँ तुम्हारी प्रदक्षिणा करती हैं

नित अश्रु-जल से आचमन करती हूँ
माटी से तन को.. दिए सा गढ़ती हूँ
नेह की बाती प्रज्वलित है हृदय की अग्नि से
आकाश मे समाहित समस्त ऊर्जा को समेट
श्वास दर श्वास आती जाती प्राण वायु की लय पर
सिमरती हूँ सिर्फ़ तुम्हारा नाम.............

ये मिट्टी, पानी, अग्नि, वायु और आकाश
मेरे पंचतत्वों का अर्घ्य समर्पित है तुम्हे

स्वीकार लेना....क्योंकि मैं प्रतीक्षा मे नहीं हूँ
..................................प्रार्थना में हूँ ||

दुरूह हूँ ........



मुझ तक पहुँचने के लिए...

तुम्हे पीर के पर्वत पर अनवरत चढ़ना होगा
दुखों के गहरे गह्वर को फर्लांग तो पाओगे?

निराशा की अंधेरी कंदराएँ  भटका देंगी तुम्हें
झरनों के चीखते सन्नाटो से डर तो न जाओगे?

विरह के सघन वनो का  विस्तार भी मिलेगा
एकांत के जलते मरुथल मे नंगे पाँव चल पाओगे?

मूसलाधार बरसती उन्मत्त आँखों मे कई बार डूबोगे
प्रेम की प्रचंड उद्दाम बहती नदी मे तैर पाओगे?

हाँ! इतनी आसान नहीं हूँ मैं, जितनी दिखती हूँ
दुरूह हूँ .........दुर्गम हूँ!!

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2012

रेड वाइन



तुम्हारी
रेड वाइन का एक घूँट
पीकर देखना चाहती हूँ
जानना चाहती हूँ
क्या उसका नशा
वैसा ही सुर्ख होता है
जैसा मेरा प्यार ?

भीतर जाने पर
क्या वो सुर्ख तरल
सियाह उदासी के
गाढ़े द्रव को हटा देता है?
जिसको रोज़
आकंठ पिया है मैंने .

यदि जवाब "हाँ" हो
तो डूब जाना चाहती हूँ
इस लाल समंदर में ......

बुधवार, 15 फ़रवरी 2012

बाँध मौन का





इसलिए मौन हूँ कि ..
दर्द की मेरी अनुभूतियाँ
तुम्हें भी व्यथित करेंगी
मेरे दुखों की चिंदियों से
तुम भी तार-तार हो जाओगे ...
पीड़ा की जिन ईंटों में
चिन दी गयी हूँ मैं
उनके भीतर तुम भी
सांस नहीं ले पाओगे ...
विराग में भी अनुराग का
जो सियाह दुशाला मैंने ओढ़ा है
कांधों पे उसका बोझ
उठा नहीं पाओगे ....

नहीं कहना चाहती अपनी व्यथा
अपनी पीड़ा का इतिहास
अपने वियोग की कथा
और उपेक्षा की गाथा ...

....संभव है सुनकर

पत्थर तुम्हारे भीतर
और सख्त हो जाये
ये भी संभव है ....
मेरे स्वर का स्पर्श
स्वयं मुझे छूकर
बिखेर दे टुकड़ों में .

शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2012

दरवाज़े पर एक चेतावनी




कुछ दर्द ..सुलगते अंगार से
रखे हैं दिल में ....
उबल रहा है स्मृतियों का लावा
राख कर देने की हद तक
आकुल है परित्यक्त अंतस ..
वेदना की लपटों के हाहाकार से
धधक रहे हैं कुछ पल
अस्तित्व लील जाने को आतुर

मैंने भी दरवाज़े पर
चिपका दी है एक चेतावनी

फ़ना होने का दम रखना
तभी भीतर कदम रखना .

रोज़ ...हर रोज़



रोज़ ...हर रोज़
मुँह अँधेरे से ही
शुरू हो जाती है एक जंग
उन चुनौतियों से
जो परिस्थिति ने मुझे
तोहफे में दी हैं .

रोज़ ..हर रोज़
मुँह अँधेरे से ही
जुट जाती हूँ मय असबाब
जंग जिंदगी से जो है
जिंदगी भी खूब खेल खेलती है
आज़माती है सारे जंगी दांव पेंच

रोज़ ..हर रोज़
मुँह अँधेरे से ही
बचती हूँ संभलती हूँ
उन दोधारी तलवारों से
जिन पर रोज़ ..हर रोज़
नंगे पाँव चलती हूँ
दिन भर.. मुँह अँधेरे से ही

रोज़.. हर रोज़
मुँह अँधेरे से ही
पकड़ लेती हूँ उस उम्मीद का दामन
जो ये कहती है कि
आज तुम ज़रूर जीतोगी
लेकिन दिन भर लड़कर
शाम को थक जाती हैं
सारी उम्मीदें 
लेकिन न जाने क्यूँ
रोज़ ..हर रोज़
मुँह अँधेरे से ही
वही उम्मीदें जाग जाती हैं
अंगड़ाई लेकर उठ जाती हैं
फिर लड़ने को जिंदगी की जंग .

 

बुधवार, 8 फ़रवरी 2012

सुनो चाँद








सुनो चाँद !
ये टुक सी क्यों लगा रखी है ?
नज़र रखते हो क्या ?
कि कब, कौन, कहाँ, क्यों ..
आया... गया ?
तुम्हें तो पता होगा
कौन सा स्वप्न
किन आँखों को तलाश रहा है .
या फिर ....
सर झुकाए उदास बैठा
कोई ख्वाब ...
किसकी आँखों से झरा है .
कोई अदावत है ....?
या फिर कोई नाराज़गी ?
क्यों नहीं दिखाते
सही राह हर स्वप्न को ..?
बाज़ आ जाओ चाँद
छोड़ दो करना
सपनों की पहरेदारी.
वरना.........
भटकते ख्वाब
आंसुओं की जो लकीर खीचेंगे
उनमे भटक जाओगे
तुम भी ......
नहीं रहोगे तुम भी
किसी के
महबूब .........||

आ जाओ



खामोश है सारी कायनात
कुछ बोल दो
लब खोल दो
तो सब गुनगुना उठें

इत्र चुक गया है
खुश्बुएं गुम हैं
एक बार आ जाओ
तो सारा शहर महक उठे

ठंडा पड़ गया है प्रेम परबत
थोड़ी सी उष्मा दो
सब पिघल जाए
सागर मे मिल जाए...........

तुम्हारी याद













कभी सूने मन का हर कोना
सुखद पलों ....हसीन लम्हों...
सुहानी घड़ियों...से भर जाती है
परिपूर्ण कर जाती है..
और कभी........
आनंद का हर आवरण खींच
पीड़ा के तार कस जाती है
बेशुमार लोगों की भीड़ मे
नितांत अकेला कर जाती है
.......हाँ!...तुम्हारी याद ||

रविवार, 5 फ़रवरी 2012

एक लकीर प्यार की

रोपा था हथेली पर
एक बीज...
सोचा था ...हाथ की लकीरों में
उगेगी एक लकीर प्यार की
बढ़ते बढ़ते पहुँच जाएगी
तुम्हारे हाथों तक ..
एक साल ऐसा अकाल पड़ा
..सब लकीरें सूख गयीं
वो सब ...जो हरी थीं
कई मौसम बदले ..
कई बरसातें आयीं
कितने साल गुज़र गए
कितने ही नए बीज आकर
पड़ गए हथेली पर
अपने आप निकल आयीं
आड़ी-टेढ़ी बेतरतीब सी
कितनी ही लकीरें ...
उलझी-सिमटी ..हलकी-गहरी
जिंदगी की तरह ...
मगर अचानक ,
कोई शुभ नक्षत्र आकर
सहला गया ..सींच गया मेरी हथेली .
हरिया गयी है वो प्यार की लकीर ..
और तत्पर है ..
प्रेम की अमर बेल होने को ||

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

स्त्रियाँ कब सिरजती हैं

स्त्रियाँ कब तय करती हैं
रचनाओं का अनंत विस्तार?
कब उतरती हैं ..
काव्य की अतल गहराई में?
और कब सिरजती हैं
साहित्य के दुर्लभ पृष्ठ ?

जबकि बंधे होते है

पाँव गृहस्थी के फंदों से,
हाथ जिम्मेदारियों से,
और मन ममत्व से.
मगर विचार ...
उन्हें कौन बाँध सका है
वो तो स्वतंत्र विचरते हैं
उमड़ते हैं ...सिरजते हैं.

हैरान हूँ ये जानकार कि स्त्रियाँ

चुनते हुए चावलों से कंकड़
चुन लाती हैं कुछ शब्द
खोलते हुए मटर की फलियाँ 
खोल लेती हैं स्मृतियों की खिड़कियाँ
और विचार झरने लगते हैं
गोल दानों की तरह.

विचारों की आंच पर

तपा कर इन्हें ...
ज्यों ही तेल में लगाती हैं छौंक
लौट आती हैं वर्तमान में
मगर कड़छी  चलाते 
फिर चल पड़ता है वही कारवां .

जब वो बुहारतीं हैं

आँगन या चौबारा ...या फिर
झाडती हैं घर की धूल
तो यादों की धूल भी झड़ जाती है.
अलगनी से उतारे कपड़ों के साथ 
उतार लेतीं हैं कुछ बिम्ब
जमा देतीं हैं करीने से पंक्तियों में
जैसे अलमारी में कपडे जमाये हों.

जोड़ते हुए राशन का हिसाब

सीख जाती हैं जोड़ना छंद की मात्राएँ
बनिए का हिसाब मिलाते-मिलाते
काफिये मिलाना भी सीख जाती हैं .

निबाहते हुए एक एक ज़िम्मेदारी

रचती रहतीं हैं पंक्ति दर पंक्ति
पृष्ठ दर पृष्ठ ...नए आयाम .
हाँ ! नहीं भूलतीं छिपाकर रखना
बिखरा हुआ वो सामान
जो बाद में काम आएगा
ठीक उसी तरह ..जैसे कोई
सृजनात्मक सोच बचा लेता है
किसी अगली रचना के लिए ||

 

कुछ चित्र ये भी