शनिवार, 17 मार्च 2012

सच कहना ज़रूरी नहीं






 सहस्त्राब्दियों से
पुरुष होने के दर्प से तने हो
क्यों नहीं झाँक पाए कभी
झुक कर स्त्री मन ?

स्वयं को गढ़ने और बढ़ने हेतु
जब व्यवस्थाएं बनाई तुमने
क्यों छोड़ दिया स्त्री को
अस्पृश्य और अयोग्य की तरह ?

हर हाल में प्रतिस्पर्धा
जीतने की तुम्हारी उत्कंठा में
हर बार तुम्हारे भाल पर
स्त्री ने ही तिलक लगाया न ?

ये तुम्हारा पौरुष ही था
कि अपने मार्ग की बाधाएं
तुमने उपहार में दे दीं स्त्री को
कि इतरा सको अपनी जीत पर.

भिक्षा की तरह उसके अपने ही
अधिकार सौंपते, एक बार फिर
जीत ही गए तुम
सच कहना, स्त्री विमर्श की आड़ में
धीरे धीरे खुलते स्त्री के बंधनों से
तुम तिलमिला जाते हो न ?

उसकी उपलब्धियों पर तुम्हारी आँखें
रसोई से उठी धुआँस
और कड़वे धुंए से भर जाती हैं
सच कहना, क्या उसी रसोई में बनी रोटी में
तुमने कभी कड़वाहट महसूस की ?

उसकी कविताओं गीतों में तुम्हे
पोतड़ों से सने उसके घिनहे हाथ दिखे
सच कहना, इसी वजह से
क्या उसे भोगते हुए तुम्हे कभी घिन आई ?

उसे भोग तुम आनंदित होते रहे
उसने अपने छोटे से आनंद का भी
उपभोग नहीं किया, उसका क्या ?

तुम्हारी एक बात भी अनसुनी करे
तो तुम्हारी अवहेलना की भागी बने
और उसने जो अपने मन की
वर्षों अवहेलना की, उसका क्या ?

2 टिप्‍पणियां:

  1. तूलिका..जब भी तुम्हारा लिखा कुछ भी पढती हूँ तो यकीन जानो अंदर से यही आवाज़ आती है कि तुम्हारा हरेक शब्द...इसलिए चिल्ला चिल्ला कर बोलता है...क्यूंकि तुम जो भी लिखती हो उसमें डूब के लिखती हो ,बहुत अधिक महसूस करके लिखती हो .
    अपने अमन की अवहेलना वाली बात पे अपना लिखा कुछ साझा कर रही हूँ....आशा करती हूँ ..तुम्हें धृष्टता नहीं लगेगी

    कौन हूँ मैं?
    कितनी बार यह सवाल खुद से करती हूँ ...
    फिर तुम्हारी बातों में से ही ..
    एक उत्तर खोज लेती हूँ
    क्यूंकि ,
    अधिकतर ,मैं वही सोचती हूँ
    जो सब चाहते हैं कि मैं सोचूं .
    मेरा मन...??
    वो क्या है ...
    सबके मन की करते -करते
    भूल चुकी हूँ कि मेरे पास भी
    अपना एक मन है .
    मेरा दिमाग ???
    औरतों के पास भी दिमाग होता है क्या???
    कभी इस्तेमाल करती और कोई सराहता
    तो ही उसे जानती ,पहचानती न !
    मेरी भावनाएं????
    उनकी मुझे क्या ज़रूरत
    मेरा तो धर्म है ...
    सबकी खुशी में खुश होना और दुःख में दुखी .
    मेरी इच्छाएं?????
    मैं मजाक कर रही हूँ क्या?????
    मैं और तुम अलग हैं क्या
    जो तुम चाहो
    बस वही होनी चाहिए मेरी इच्छा .

    न मन अपना,न भावनाएं अपनी
    न दिमाग अपना ,न इच्छाएं अपनी
    न सोच अपनी,न खुशी- गम अपने
    अच्छा ,तुम ही कहो न?!
    मैं सजीव हूँ या निर्जीव ....??????

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  2. तुम्हारी कही बात धृष्टता कैसे लगेगी मेरी जान .....अगर ऐसा होगा तो म्रेरी कही बात भी धृष्टता ही होगी ...क्योंकि एक सा सोचते हैं न ....और रही बात मन की अवहेलना पर तुम्हारी कविता की बात ..तो सुनो मेरी जान ..इस पर तो डिबेट करानी है

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