बुधवार, 5 दिसंबर 2012

खाली काग़ज़

सारी रात.......
शब्द बुने...अर्थ गढ़े
दिन के उजाले मे
कुछ मानी तलाशे
और फिर.....
शाम की हथेली पर
बस खाली काग़ज़ रख दिया
....................
क्या वो नज़र
पढ़ पाएगी ये अफ़साना ?



6 टिप्‍पणियां:

  1. पढ़ लिया सब निधि .... समझ गयी :)

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  2. खाली कागज़ पढने और पढ़ाने की सीमा से बाहर ...

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  3. शाम की हथेली पर
    बस खाली काग़ज़ रख दिया
    ....................
    क्या वो नज़र
    पढ़ पाएगी ये अफ़साना ?


    अवश्य वो नज़र
    पढ़ पाई होगी ये अफ़साना तूलिका जी
    :)

    बेहतरीन !
    कमाल की संवेदनशीलता !
    वाऽह ! वाऽऽह !! वाऽऽऽह !!!

    शुभकामनाओं सहित…

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  4. आपि किस रचना को कविता मंच पर साँझा किया गया है

    संजय भास्कर
    कविता मंच
    http://kavita-manch.blogspot.in

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