शुक्रवार, 21 सितंबर 2012

बादल



बादल !
जो आए हो तो
लिए जाना ..
थोड़ा नमक
मेरी आँखों का ...
थोड़ा परस
मेरे पोरों का..
थोड़ा रंग
मेरी प्रीत का..
एक बंदिश
मेरे गीत की ..
इक अगन
मेरे देह की ..
एक पाती
मेरी रूह की ...
हो सके तो
बरस जाना
उसके मन की
अंधेरी गुफा में
जहाँ रहती है
मेरी प्रीत ..
दरवेश बन के ............





7 टिप्‍पणियां:

  1. एहसासों की महक भी लिए जाना...
    तभी तो वो पहचानेगा..........
    <3
    अनु

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    1. अनु ...वो बिना एहसासों के सिर्फ़ सूने शब्दों से भी पहचान लेगा ..

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  2. कितने सुन्दर एहसास ..चित्र भी सुन्दर ...मुग्ध करती रचना ...!!
    बहुत बहुत सुन्दर ....!!

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  3. यार ...सारी इन्द्रियों से जब बादल कुछ न कुछ लेकर जाएगा ...उसके मन की अंधेरी गुफा में बरसने ..तो तैयार रहना तेरी प्रीत जो अभी ता दरवेश सी रहती है वहाँ....वो वहीं जड़ें जमा लेगी...हमेशा के लिए .

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  4. कहाँ से भावनाओं के भाप सोखे और शब्दों के बादल बनाये ... इन्द्र भी हैरां हैं

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