शनिवार, 28 जनवरी 2012

डोर

सुनो
ज़रा डोर थामो ना
पतंग की तरह
आसमान मे उड़ना चाहती हूँ.

सूरज के पास जा
पूछना चाहती हूँ ..
क्यों दबाए हो सीने मे
इतनी आग?
किसके विरह मे जल रहे हो
सदियों से....?

बादल भटकती रूह से
दिखाई देते हैं मुझे
उन्हें सहलाकर..उनके दर्द को
महसूस करना चाहती हूँ.
सीखना चाहती हूँ उनसे
कि कैसे चल पाते हैं वो
लेकर इतने आँसू?

दौड़कर हवा को
पकड़ लेना चाहती हूँ
ये पूछने को.. कि
किसकी छुअन से महक गयी है
..बावरी हो गयी है.

दूर देस से आए
पंछियों से भी काम है
थोड़ी सी प्रेम की उष्मा
भिजवानी है परदेसी तक
कि उसकी बर्फ बनी संवेदनाएँ
पिघल सकें.

मन के चरखे पर
अनवरत...यादों का धागा
कातने का हुनर
चाँद से सीखना है मुझे.

आसमान के दरवाज़े पर
गुज़ारिश की एक
चिट्ठी भी रखनी है
कि मुझे तकते हुए देखे
तो एक सितारा गिरा दे
और मैं माँग सकूँ
........अपनी चाहत ||

6 टिप्‍पणियां:

  1. आसमान के दरवाज़े पर गुज़ारिश की एक चिट्ठी भी रखनी है...

    बहुत अच्छी कविता है. बधाई.

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  2. KC आपकी बेवजह सी बातों सी....मेरी गुज़ारिशों की चिट्ठियाँ भी बहुत सी हैं.........पसंद करने का शुक्रिया

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  3. दूर देस से आए
    पंछियों से भी काम है
    थोड़ी सी प्रेम की उष्मा
    भिजवानी है परदेसी तक
    कि उसकी बर्फ बनी संवेदनाएँ
    पिघल सकें.
    इन पंक्तियों का सच ..बहुत ही गहरे उतर गया..नमन आपकी लेखनी को ...।

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  4. बहुत खूबसूरत तूलिका...
    हर ख्वाहिश पूरी हो...

    अनु

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  5. बहुत अच्छी कविता है। इसी संदर्भ में इसे भी पढ़िये...

    http://www.facebook.com/devendra.pandey.188?sk=notes

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