सोमवार, 13 अगस्त 2012

दो झीलें

 









आँखों की
दो छोटी झीलों में
भर रखा है
थोड़ा खारा जल ....
दर्द का
इतना ताप मत देना
कि सूख कर
बंजर हो जाए
सपनों की
मेरी ये ज़मीं ...........


13 टिप्‍पणियां:

  1. इन पनीली आँखों में ही तो डूबता उतराता है वो....कैसे सूखने देगा भला..........

    अनु

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    1. इन कतरों को समंदर होने की चाह है अनु

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  2. कल 17/08/2012 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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    1. बहुत शुक्रिया ....ज़रूर आऊँगी लिंक पर

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    2. सपनों की साँसों की डोर न टूटे कभी
      इनकी ज़मीन न सूखे कभी
      हर हाल तुम इन्हें जिलाए रखना
      बाक़ी मेरा क्या है
      रहूं न रहूं....

      हमेशा तेरे लिए ..यही है दुआ .

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  3. वाह ||
    बहुत खूब....
    बहुत सुन्दर:-)

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